मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: जेन-जी, जंतर-मंतर और भागवत के बयान के सियासी मायने?

पॉलिटिका: जेन-जी, जंतर-मंतर और भागवत के बयान के सियासी मायने?

क्या बदल गया है संघ? या बदली रणनीति?

के.पी. मलिक

संघ ने पहली बार शायद इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया कि आने वाली राजनीति सिर्फ मंदिर, राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक विमर्श तक सीमित नहीं रह सकती। अब रोजगार, तकनीक, अवसर और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति को भी समान महत्व देना होगा।

मुंबई में IIMUN के मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का भाषण केवल युवाओं को संबोधित एक प्रेरक वक्तव्य नहीं था। यह उस दौर में आया है, जब देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। इसलिए इस भाषण को केवल शब्दों के स्तर पर नहीं, बल्कि उसके समय, संदर्भ और राजनीतिक संकेतों के साथ पढ़ना होगा। भागवत ने जेन-जी को अपनी पीढ़ी से अधिक ईमानदार, अधिक देशभक्त और अधिक संवेदनशील बताया। उन्होंने कहा कि यदि युवाओं से समय रहते संवाद किया गया होता तो जंतर-मंतर जैसा आंदोलन शायद पैदा ही नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन संवाद का माध्यम है और प्रदर्शन करने वाले युवाओं को `एंटी-नेशनल’ कहना गलत है।
यह वही संघ है, जिसकी वैचारिक धारा पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि असहमति को राष्ट्र-विरोध से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में संघ की सोच बदल रही है, या फिर राजनीतिक परिस्थितियां संघ को अपनी भाषा बदलने पर मजबूर कर रही हैं? यही इस पूरे भाषण का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की राजनीति में एक नया सामाजिक वर्ग तेजी से उभरा है-जेन-जी। यह वह पीढ़ी है, जो न तो पारंपरिक राजनीतिक नारों से प्रभावित होती है और न ही केवल भावनात्मक मुद्दों पर वोट करती है। उसके सामने बेरोजगारी, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं, आर्थिक असुरक्षा, डिजिटल भविष्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), जलवायु संकट और सामाजिक समानता जैसे वास्तविक प्रश्न हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर जैसे छात्र आंदोलनों ने केवल सरकार ही नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को यह संदेश दिया कि आज का युवा पहले की तरह चुप रहने वाला नहीं है। वह सवाल पूछता है, संगठित होता है और सोशल मीडिया के माध्यम से अपना नैरेटिव भी स्वयं तैयार करता है। ऐसे समय में भागवत का यह कहना कि `आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा है’ और `युवाओं को राष्ट्रविरोधी कहना गलत है’, दरअसल उस राजनीतिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति भी माना जा सकता है जिसे अब नजरअंदाज करना संभव नहीं रहा।
इस भाषण में केवल आंदोलन की बात नहीं थी। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताई, रोजगार की चुनौतियों को स्वीकार किया, महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता बताई, एआई के प्रभाव पर चर्चा की, पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया, चीन और पाकिस्तान जैसे भू-राजनीतिक मुद्दों पर युवाओं की भूमिका का उल्लेख किया और थ्उँऊैं जैसे विषय पर भी अपेक्षाकृत संतुलित भाषा अपनाई। इन सभी मुद्दों की एक समान विशेषता है कि ये वही विषय हैं जिन पर आज की युवा पीढ़ी सबसे अधिक चर्चा करती है।
यानी संघ ने पहली बार शायद इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया कि आने वाली राजनीति सिर्फ मंदिर, राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक विमर्श तक सीमित नहीं रह सकती। अब रोजगार, तकनीक, अवसर और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति को भी समान महत्व देना होगा। लेकिन यहीं दूसरा प्रश्न भी उठता है।
यदि संवाद इतना ही महत्वपूर्ण था तो पिछले कई वर्षों में छात्रों के आंदोलनों को लेकर सत्ता और उसके समर्थक वर्ग की भाषा इतनी कठोर क्यों रही? विश्वविद्यालयों में विरोध करने वाले छात्रों को कई बार `टुकड़े-टुकड़े गैंग’, `अर्बन नक्सल’ या `राष्ट्र-विरोधी’ जैसे विशेषण क्यों दिए गए? यदि लोकतांत्रिक विरोध उचित है तो यह स्वीकारोक्ति पहले क्यों नहीं आई? यही विरोधाभास भागवत के पूरे भाषण को राजनीतिक दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। संभव है कि संघ यह समझ चुका हो कि जेन-जी के साथ वैचारिक टकराव की राजनीति लंबे समय तक लाभकारी नहीं होगी। आने वाले चुनावों में यही पीढ़ी निर्णायक मतदाता बनने जा रही है। करोड़ों नए मतदाता पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेंगे। वे केवल इतिहास नहीं, अपना भविष्य भी देखेंगे। ऐसे में संवाद की भाषा, सहमति की राजनीति और युवाओं को सम्मान देने वाला विमर्श केवल नैतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति भी हो सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भागवत ने अपने भाषण में आरक्षण पर कोई टकरावपूर्ण टिप्पणी नहीं की। यह भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं। संघ शायद अब उन विषयों पर प्रत्यक्ष टकराव से बचना चाहता है जिनसे व्यापक सामाजिक असंतोष पैदा हो सकता है। एआई पर उनका जोर भी केवल तकनीकी चर्चा नहीं था। यह स्वीकार करना कि आने वाला भारत तकनीक आधारित होगा, संघ की उस नई सोच की झलक देता है जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ तकनीकी राष्ट्रवाद को भी जोड़ा जा रहा है। लेकिन केवल भाषण बदल जाने से राजनीति नहीं बदलती। असल परीक्षा तब होगी जब इन विचारों का प्रभाव सरकार की नीतियों में दिखाई देगा। क्या शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होंगे? क्या रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलेगी? क्या छात्रों के विरोध को भविष्य में भी लोकतांत्रिक अधिकार माना जाएगा? क्या सोशल मीडिया पर असहमति रखने वालों को राष्ट्रविरोधी बताने की प्रवृत्ति समाप्त होगी? क्या संवाद केवल भाषणों तक सीमित रहेगा या शासन की कार्यशैली का हिस्सा भी बनेगा?
यही वे सवाल हैं जिन पर आने वाला समय पैâसला करेगा। भारतीय राजनीति में संघ केवल एक वैचारिक संगठन नहीं बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाला प्रभावशाली केंद्र भी माना जाता है। इसलिए मोहन भागवत का हर सार्वजनिक वक्तव्य व्यापक राजनीतिक अर्थ रखता है। उनके शब्द अक्सर भविष्य की वैचारिक दिशा का संकेत माने जाते हैं। इसलिए मुंबई का यह भाषण केवल युवाओं की प्रशंसा नहीं है। यह उस बदलते भारत की स्वीकारोक्ति भी है, जिसमें नई पीढ़ी अब सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने वाली शक्ति बन चुकी है। बहरहाल, संभव है कि यह संघ का वैचारिक विस्तार हो। यह भी संभव है कि यह बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप भाषा और रणनीति का पुनर्निर्माण हो। और यह भी संभव है कि दोनों बातें एक साथ सच हों। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी विचार की वास्तविक विश्वसनीयता उसके शब्दों से नहीं, उसके व्यवहार से तय होती है। अब देश की निगाहें इस पर होंगी कि क्या मोहन भागवत के ये बयान केवल मंच तक सीमित रहते हैं, या फिर आने वाले समय में सरकार, संघ और सत्ता की राजनीति में भी इनकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। क्योंकि आज का भारत सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि संघ क्या कह रहा है। वह यह भी पूछ रहा है कि संघ आगे क्या करने जा रहा है।
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)़

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