तौसीफ कुरैशी
-सवाल शुल्क का नहीं, भारत के आर्थिक स्वाभिमान का है
एक समय था जब जेब में नकद नहीं होता था तो खरीदारी करने से पहले यह सोचना पड़ता था कि दुकानदार कार्ड स्वीकार करेगा भी या नहीं। यदि कार्ड स्वीकार कर भी लिया तो एक नई बहस शुरू हो जाती थी, ‘दो प्रतिशत एक्स्ट्रा देना पड़ेगा।’ दुकानदार का तर्क होता था कि बैंक और कार्ड कंपनियां उसका पैसा काट लेती हैं इसलिए वह इस अतिरिक्त बोझ को ग्राहक पर डाल रहा है। ग्राहक मजबूर था, क्योंकि पूरी व्यवस्था विदेशी कंपनियों के इर्द-गिर्द घूमती थी। ‘वीसा’ और ‘मास्टरकार्ड’ जैसे नाम केवल कार्ड नहीं थे; वे उस आर्थिक ढांचे के प्रतीक थे, जिसमें हर लेन-देन की कीमत भारतीय जेब से निकलकर वैश्विक वित्तीय कंपनियों तक पहुंचती थी।
डिजिटल क्रांति: भरोसे और सहजता का नया दौर
फिर भारत में डिजिटल भुगतान की एक नई पटकथा लिखी गई। यू.पी.आई. आया, रूपे आया और भीम आया। इसके साथ ही पेटीएम, गूगल पे और फोनपे जैसे मंचों ने भुगतान की पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी। चाय वाले से लेकर रिक्शाचालक तक के पास क्यू.आर. कोड दिखाई देने लगा।
यह केवल तकनीक का विस्तार नहीं था, बल्कि उस भरोसे का विस्तार था कि बिना किसी अतिरिक्त शुल्क और झंझट के, महज कुछ सेकंड में भुगतान हो सकता है। दुनिया ने भारत के इस मॉडल की मुक्त कंठ से सराहना की और कई देशों ने इसे अपनाने में रुचि दिखाई। इसे ‘डिजिटल इंडिया’ की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना गया।
शुल्क का गणित और व्यावहारिक अर्थशास्त्र
लेकिन अब एक नई चर्चा तेजी पर है। कहा जा रहा है कि दो हजार रुपए से अधिक के यू.पी.आई. लेन-देन पर शुल्क लगाने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। सरकार चाहे इसे व्यापारियों पर लागू होने वाला शुल्क बताए, लेकिन बाजार का गणित राजनीतिक दावों से नहीं चलता। कोई भी दुकानदार यह पैसा अपनी जेब से नहीं देता; वह हर अतिरिक्त लागत को सामान की कीमत में जोड़ देता है और अंतत: इसका भुगतान आम नागरिक को ही करना पड़ता है। इसलिए यह कहकर जनता को भ्रमित करना कि शुल्क केवल व्यापारी देगा और आम जनता पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, व्यावहारिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता।
विदेशी दबाव और नीतिगत पारदर्शिता की चुनौती
इन चर्चाओं के साथ राजनीतिक गलियारों में यह गंभीर आरोप भी तैर रहा है कि अमेरिका चाहता है कि भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर ऐसे नियम लागू हों, जिनसे विदेशी भुगतान कंपनियों के लिए पुन: बाजार में जगह बन सके। यदि ऐसा कोई विदेशी दबाव नहीं है तो सरकार को स्पष्ट शब्दों में देश को आश्वस्त करना चाहिए। यदि भारत ने अपने ही हाथों से निर्मित सशक्त व्यवस्था को कमजोर करने का निर्णय लिया तो यह केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि एक बड़ी मनोवैज्ञानिक पराजय होगी। यही वह मोड़ है, जहां राजनीति और अर्थशास्त्र आमने-सामने खड़े होते हैं।
रिजर्व बैंक की स्वायत्तता और जन-विश्वास
सवाल केवल शुल्क का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी सबसे सफल डिजिटल उपलब्धि को पुन: उसी ढर्रे पर धकेलेगा, जहां कभी विदेशी कंपनियां शुल्क तय करती थीं और भारतीय उपभोक्ता मूकदर्शक बनकर भुगतान करता था? क्या हमने इतनी बड़ी क्रांति इसलिए की थी कि अंतत: फिर वही पुराना दौर लौट आए?
इस पूरे प्रकरण में भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका पर भी बहस होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में केंद्रीय बैंक की वास्तविक ताकत उसकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता होती है। जनता अपेक्षा करती है कि वह केवल नीतिगत पैâसलों का विस्तार मात्र न बने, बल्कि देश की वित्तीय व्यवस्था के एक निष्पक्ष संरक्षक के रूप में कार्य करे। यदि किसी नीति से करोड़ों उपभोक्ताओं और लाखों छोटे व्यापारियों का हित जुड़ा हो तो उसका निर्णय व्यापक विचार-विमर्श, पूर्ण पारदर्शिता और स्पष्ट आर्थिक तर्कों के आधार पर होना चाहिए।
डिजिटल अर्थव्यवस्था और भरोसे की रक्षा
डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता और सुलभता है। जिस दिन आम आदमी को यह महसूस होने लगेगा कि हर बड़े लेन-देन पर अतिरिक्त लागत जुड़ सकती है, उसी दिन नकद लेन-देन पुन: आकर्षक लगने लगेगा। इससे डिजिटल अर्थव्यवस्था की गति भी धीमी पड़ सकती है इसलिए नीतियां बनाते समय केवल राजस्व वसूली ही नहीं, बल्कि जन-व्यवहार और विश्वास का संतुलन रखना भी अनिवार्य है।
सरकार को यह याद रखना होगा कि यू.पी.आई. केवल एक तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं है, बल्कि यह विश्व पटल पर भारत की नई पहचान बन चुका है। जिस व्यवस्था को दुनिया एक आदर्श उदाहरण के रूप में देख रही थी, उसे कमजोर करनेवाला कोई भी कदम बेहद सोच-समझकर उठाया जाना चाहिए। यदि भुगतान व्यवस्था के संचालन की लागत बढ़ भी रही है तो उसका ऐसा समाधान खोजा जाए जो आम नागरिक के मन में यह भावना न पैदा करे कि मुफ्त और सहज डिजिटल भुगतान का युग समाप्त हो रहा है।
लोकतंत्र में जनता केवल कर नहीं देती, बल्कि सरकार पर अपना विश्वास भी व्यक्त करती है। आर्थिक स्वाभिमान की रक्षा भाषणों से नहीं, बल्कि जनहितैषी नीतियों से होती है। यदि नीति जनता के विश्वास को मजबूत करती है तो वह इतिहास बनती है और यदि वही नीति मन में संदेह के बीज बो दे, तो इतिहास एक दिन गंभीर सवाल बनकर सामने खड़ा हो जाता है।
सत्यमेव जयते।
