राजेश विक्रांत
मराठी की चर्चित लेखिका प्रतिभा सराफ मुंबई के एक कॉलेज में फिजिक्स की लेक्चरर रह चुकी हैं। उन्होंने कहानी, कविता, उपन्यास, बाल साहित्य, आलोचना समेत अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। उनके मराठी कहानी संग्रह “अनाकलनीय”, जिसे तकरीबन एक दर्जन प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं, का डॉ गोरख थोरात द्वारा अनुवादित है ‘दस्तखत की मुहर’।
दस्तखत की मुहर में 15 कहानियाँ है- खुशी के पल, पूनम का चांद, कहां गई होगी नताशा? उस द्वीप पर, अधिवास, सलाम डॉक्टर कुणाल! शुद्धिकरण, यह और वह, नियति, भिन्न, पीड़ादायी संतान अभिभावक संघ, बेबसी, माफी, दत्तक तथा शीर्षक कहानी दस्तखत की मुहर। पुस्तक के बारे में डॉ. सूर्यबाला लिखती हैं कि, “वैविध्य की दृष्टि से आपको इस संग्रह में एक साथ प्रेम, परिवार और समाज की अन्यान्य परिस्थितियों से लेकर रहस्य, रोमांच, विज्ञान, विट, और चमत्कार सब कुछ उपलब्ध होगा। सहज पठनीयता इन कहानियों का सर्वोपरि गुण है जो आद्यंत पढ़ने वालों को बांधे रखती है।लेखिका की भाषा जीवंत और दृश्य, घटना तथा चरित्रों को प्रत्यक्ष कर देने वाली है। आप कहानियों को सिर्फ पढ़ नहीं देख भी रहे होते हैं। प्रतिभा के ज्ञान और अनुभव की संपदा इन कहानियों का अर्जित है। विवरण अत्यंत रोचक तथा संवाद जीवंत हैं।”
डॉ सूर्यबाला की बात से मैं शत प्रतिशत सहमत हूं। लेखिका ने बहुत दिल लगाकर इन कहानियों को लिखा है। संग्रह की पहली कहानी ‘खुशी के पल’ जितेश व नम्रता की कहानी है। यूनिवर्सिटी में दोनों के बीच प्रेम के अंकुर फूटते हैं। एमएससी पार्ट वन के बाद जितेश को जर्मनी में नौकरी मिल जाती है। वह चला जाता है। एमएससी पार्ट 2 के बाद नम्रता की भी शादी हो जाती है और वह पति के साथ अमेरिका चली जाती है। एक पुत्री जिया की मां बनती है। उसके 5 साल बाद पति की एक्सीडेंट में मृत्यु हो जाती है। फिर नाटकीय परिस्थितियों के चलते जितेश व नम्रता शादी के बंधन में बंधते हैं। ‘पूनम का चांद’, ‘कहां गई होगी नताशा?’ और ‘उस द्वीप पर’ कहानियों में रिश्तों की संवेदनाएं हैं, अनकही व्यथा है तथा खोए हुए प्रेम की गाथा है। जीवन के छोटे-मोटे संघर्षों की मानवीयता से पगी अनुभूतियों का जीवंत चित्रण इन कहानियों में मिलता है। पढ़ाई, कॉलेज व विश्वविद्यालय की बात तो इन कहानियों का मुख्य तत्व है ही।
‘अधिवास’ कहानी का ताना-बाना रहस्य रोमांच के इर्द-गिर्द बना गया है। कहानी की पृष्ठभूमि मुंबई के खार का नंदनवन नामक एक भव्य व बड़ा बंगला है। जहां पर तेजस रायकर उनकी पत्नी अचला व दो बच्चे रायन व मुग्धा रहते हैं। एक दिन अचानक रायन का डॉग रॉबी बंगले से गायब हो जाता है। सब दुखी हो जाते हैं। तेजस दूसरा डॉग टिल्लू घर में लाता है पर रायन उसकी ओर देखता तक नहीं, और टिल्लू भी एक महीने में गायब हो जाता है। यह बहुत बड़ी दुखद स्थिति हो जाती है। कुछ दिन बाद परिवार पर दुखों का एक बड़ा पहाड़ टूट पड़ता है। मुग्धा भी लापता हो जाती है। इन रहस्यमयी गुमशुदगियों का पता लगाने के लिए रायकर परिवार बंगले में सीसीटीवी लगाता है। फुटेज से पता चलता है कि उनके बगीचे में लगा एक पेड़ ड्रोसेरा ही मुख्य अभियुक्त है। लगभग तीन से साढ़े तीन फीट ऊंचे पेड़ के तने में बहुत मोटी चौकीदार गोलाकार टहनियां हैं जो लगभग जमीन को छूती हैं। आधी रात को जब एक बिल्ली पेड़ के नीचे टहल रही होती है तो उसकी टहनी झट से बिल्ली को अंदर खींच लेती है। उस गोलाकार टहनी के अंदर खींचे जाते समय बिल्ली जोर से चीखती है। लेकिन टहनी उसके मुंह की ओर से बंद हो जाती है। धीरे-धीरे चीखों की आवाज़ भी क्षीण होकर बंद हो जाती है। यह देखकर सभी हैरान हो जाते हैं। यह बहुत अलग किस्म का ड्रोसेरा है जो इतने बड़े जानवर को उठा सकता है, मार सकता है और पचा भी सकता है।एक्सपर्ट कहते हैं कि उन दो कुत्तों और मुग्धा को भी इस पेड़ ने निगल लिया होगा। देखते ही देखते खार, मुंबई के नंदनवन बंगले की घटना की चर्चा देश-विदेश तक पहुंच जाती है। परेशान रायकर परिवार एक दिन नंदनवन छोड़ने का फैसला कर लेता है। और रायन जाते समय दुख भरी आवाज से दूर से ड्रोसेरा को देखते हुए हाथ हिला कर बोलता है- बाय बाय रॉबी… बाय-बाय टिल्लू… बाय-बाय मुग्धा..।
‘सलाम डॉक्टर कुणाल!’ का सबक है कि “अच्छी चीज यूं ही नहीं मिलती वह कड़ी मेहनत से प्राप्त होती है।” ‘शुद्धिकरण’ कहानी नेचुरोपैथी सेंटर में एक महिला के अनुभव के बारे में बताती है- “शरीर के अलग-अलग अंग शुद्ध हो गए थे। यह देखने के बाद कि दुनिया में कितने कष्ट हैं, मुझे महसूस हुआ हम कितने सुखी हैं। और मन का शुद्धिकरण हो गया। मोहन के आलिंगन में आत्मा का परमात्मा से मिलन का भाव जागृत हुआ। उस क्षण मुझे भीतर से तीव्रता से ऐसा लगा जैसे मेरी आत्मा भी शुद्ध हो गई है। मेरा पूरा शरीर पंख के समान हल्का हो आया।” ‘यह और वह’ का आखिरी पैरा कहानी का सार है- “डॉक्टरों ने भी मरणासन्न बच्चे की मां की आखिरी इच्छा पूरी करने की ठान ली और नंदेश की किडनी अनिरुद्ध में ट्रांसप्लांट कर दी। दो-चार महीनों में अनिरुद्ध सामान्य जीवन जीने लायक हो गया। किसने किसका शुक्रिया अदा किया यह अहम नहीं था। नंदेश अमर हो गया और अनिरुद्ध पूरी तरह से जिंदगी जीने में सक्षम।” ‘नियति’ की पृष्ठभूमि बॉलीवुड है- “इंसान की जिंदगी एक फिल्म ही तो है। वह कब और कौन सा मोड़ लेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। फिल्म का समापन इंसान तय करता है लेकिन असल जिंदगी की फिल्म का समापन नियति ही तय करती है और यही सच्चाई है।”
आदित्य के खूबसूरत प्यार की कहानी है ‘भिन्न’- “मुझे महसूस हो रहा था कि यह भिन्न व्यक्तित्व वाले दो लोगों के जीवन की शुरुआत हुई है। लेकिन ‘अपोजिट पोल्स अट्रैक्ट ईच अदर’ के सिद्धांत के अनुसार मेरे मन में यह विश्वास पैदा हुआ कि हम हमराह बनकर जिंदगी का एक बड़ा मुकाम यकीनन हासिल करेंगे और मैंने अनायास ही कह दिया- आई लव यू आदित्य। उसने भी उतनी ही संजीदगी से कहा- आई लव यू टू।” ‘पीड़ादायी संतान अभिभावक संघ’ कहानी रिश्ते के उतार-चढ़ाव को व्यक्त करती है।
‘बेबसी’ शीर्षक की कहानी में असल्फा विलेज की एक झोपड़पट्टी में रहने वाली शांताबाई के हालात की त्रासदी है। संबंधों में मार्मिकता का परत दर पर आख्यान है ‘माफी’। संवेदनात्मक भावभूमि के चलते ‘दस्तक’ उल्लेखनीय कहानी है जबकि शीर्षक कहानी ‘दस्तखत की मुहर’ प्रशासनिक व्यवस्था में विसंगतियों को उजागर करती है। एक शिक्षण संस्थान में सांस्कृतिक प्रमुख नियुक्त होने पर क्या-क्या तकलीफें होती हैं, उसका जिक्र इस कहानी में संवेदनशीलता के साथ किया गया है। इस कहानी का निचोड़ है कि सिर्फ जिम्मेदारी दीजिए सहयोग व समर्थन नहीं, लेकिन इससे सामने वाले को क्या परेशानियां होती हैं, उन पर कोई ध्यान नहीं देता।
कहानीकार प्रतिभा सराफ ने लिखा है कि, “देखी.. सुनी.. महसूस हुई.. घटनाओं की परिणति हैं ये कहानियां।” यह एकदम सही है। सारी कहानियां लेखिका के निजी अनुभव से उपजी हैं। डॉ गोरख थोरात का अनुवाद बेहतरीन है। पुस्तक का प्रकाशन माय मिरर पब्लिशिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड, पुणे ने किया है। पृष्ठ संख्या 192 है और मूल्य 250 रुपए।
