तौसीफ कुरैशी
छात्रों ने फिर पूछ दिया, कुर्सी कितनी भी ऊंची हो, सवाल से ऊंची वैâसे हो सकती है? जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो सत्ता के चेहरे का नकाब उतरता है। डिग्री लेने से पहले ही छात्रों ने सत्ता का चरित्र पढ़ लिया है और एक-एक करके सबको बेनकाब कर रहे हैं। बेनकाब करने का मतलब कपड़े उतारना नहीं, बल्कि कुर्सी के पीछे छिपे व्यक्ति को उसके अपने शब्दों और कर्मों के सामने ला खड़ा करना है। जो जितने बड़े पद पर बैठा है, छात्र उतने ही बड़े सवाल के साथ उसके सामने खड़े हो रहे हैं।
हैदराबाद के नलसार लॉ विश्वविद्यालय के लगभग ४५० छात्रों ने ऐसा ही किया है। कानून पढ़ने वाले इन छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि २०२६ के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने के पैâसले पर पुन: विचार किया जाए। इसे कोई मामूली विश्वविद्यालयी विवाद समझे तो उसकी समझ पर तरस आता है; क्योंकि मामला यह नहीं है कि मुख्य अतिथि कौन होगा, बल्कि मामला यह है कि क्या मुख्य न्यायाधीश भी सवालों के घेरे में आ सकते हैं?
छात्रों का जवाब है, क्यों नहीं? यही लोकतंत्र है। यदि आप न्यायपालिका हैं तो आपका सम्मान होगा, लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि आपके शब्दों और पैâसलों पर कोई सवाल ही न उठाए। संविधान ने किसी पद को आलोचना से ऊपर नहीं रखा है। कुर्सी ऊंची हो सकती है, लेकिन संविधान से ऊंची नहीं। कानून के विद्यार्थी यह बात सबसे बेहतर समझते हैं।
उन्होंने सीजेआई से जुड़ी कुछ पुरानी टिप्पणियों पर आपत्ति जताई है, जिसमें ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी का हवाला भी दिया गया है। हालांकि, यहां तथ्य का दूसरा पक्ष यह है कि बाद में स्पष्ट किया गया था कि वह टिप्पणी युवाओं के लिए नहीं, बल्कि फर्जी डिग्री लेकर वकालत करने वालों के संदर्भ में थी। यदि टिप्पणी का संदर्भ अलग था, तो वह छात्रों के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए, उन्हें समझाया जाना चाहिए और उनसे संवाद होना चाहिए।
लोकतंत्र में नागरिक बोध और संस्थाओं की जिम्मेदारी
लोकतंत्र में समस्या सवाल से नहीं होती; समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सवाल पूछने वाले को ही समस्या मान लिया जाता है। यही हमारी राजनीति और संस्थाओं की सबसे बड़ी बीमारी बनती जा रही है।
छात्र पूछता है: पेपर लीक क्यों हुआ? जवाब मिलता है: साजिश मत करो।
छात्र पूछता है: भर्ती कब होगी? जवाब मिलता है: धैर्य रखो।
छात्र पूछता है: पुलिस ने पैलेट गन और कीलों वाली लाठियां किसके आदेश पर चलार्इं? जवाब मिलता है: कानून-व्यवस्था को समझो।
जांच एजेंसियों और सत्ता का भय दिखाकर डराने वाले, जवाब देने के नाम पर गायब हो जाते हैं। छात्र जब अदालत पहुंचकर अपनी बात सुने जाने की गुहार लगाता है और वहां भी उसे लगे कि उसकी पीड़ा को समझने का समय किसी के पास नहीं है, तो वह कहां जाएगा? जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों पर छात्रों की आपत्ति इसी बेचैनी को दर्शाती है।
हालांकि, यहां न्यायिक रिकॉर्ड का पूरा तथ्य और संदर्भ देखना जरूरी है, लेकिन छात्रों की नाराजगी को केवल भावुकता कहकर खारिज करना भी गलत है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। युवा पीढ़ी इसी न्याय की मांग कर रही है। उसे केवल भाषण नहीं, भरोसा चाहिए-यह भरोसा कि अदालत में उसकी आवाज, सरकार में उसका सवाल और विश्वविद्यालय में उसकी असहमति सुनी जाएगी।
वह कह रही है, `हम आपके पद का सम्मान करेंगे, लेकिन आपके पद के आगे अपना विवेक गिरवी नहीं रखेंगे।’ यही बात पुरानी सत्ता-संस्कृति को खटकती है। पुरानी संस्कृति में विद्यार्थी का काम केवल पढ़ना, परीक्षा देना, डिग्री लेना और नौकरी ढूंढ़ना था। अब विद्यार्थी पूछ रहा है कि परीक्षा निष्पक्ष होगी या नहीं? मेरी डिग्री का बाजार में क्या मूल्य है? परिणाम कब आएगा? मेरे प्रदर्शन पर लाठियां क्यों चलीं? और जिस संविधान को मैंने किताबों में पढ़ा, वह सड़क पर मेरे साथ खड़ा क्यों नहीं दिखता?
बदलता भारत और सवालों की ताकत
यह सवाल केवल सरकार से नहीं बल्कि पुलिस, मीडिया, न्यायपालिका और स्वयं लोकतंत्र से है। क्या लोकतंत्र सिर्फ चुनाव के दिन ही नागरिक को याद करता है? छात्रों की यह नई पीढ़ी उस पुराने अनुशासन को मानने के लिए तैयार नहीं है, जहां उच्च और निम्न पद के भ्रम में सब चुपचाप बैठे रहें।
यह पीढ़ी तकनीक के माध्यम से अदालत की कार्यवाही देखती है, पैâसले और संविधान पढ़ती है, दस्तावेज खोजती है और फिर तथ्यों के साथ सवाल उठाती है। इसे डराना आसान नहीं है, क्योंकि इसके हाथ में सिर्फ पोस्टर नहीं बल्कि सूचना है और जागरूक नागरिक सत्ता के लिए सदैव असहज स्थिति उत्पन्न करता है।
नलसार का यह विरोध केवल एक संस्थान का मामला नहीं है; यह उस बदलते भारत का संकेत है, जहां विद्यार्थी अब केवल डिग्री का उपभोक्ता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सक्रिय नागरिक बनना चाहता है। वह दीक्षांत समारोह में टोपी पहनकर तस्वीर तो खिंचवाना चाहता है, लेकिन उससे पहले यह भी पूछना चाहता है कि जिस संविधान की शपथ लेकर वह कल वकालत करेगा, उसकी आत्मा आज कहां खड़ी है?
यह सवाल किसी व्यक्ति का अनादर नहीं करता, बल्कि संस्था को मजबूत बनाता है। मजबूत संस्था वह नहीं जो सवालों से बचे बल्कि वह है, जो सवाल सुनकर भी अडिग रहे। छात्रों को `देशद्रोही’, `अराजक’ या `राजनैतिक एजेंट’ कहकर बात को खारिज नहीं किया जा सकता। उनसे तर्कसंगत बहस करनी होगी, जवाब देना होगा और जहां वे सही हैं, वहां उनकी बात माननी होगी।
आज नलसार के छात्र मुख्य न्यायाधीश से सवाल कर रहे हैं, कल कोई और विश्वविद्यालय किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से करेगा। सत्ता और पद आते-जाते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन नागरिक का सवाल बना रहता है। जब छात्र सवाल पूछना सीख जाता है, तो उसे सिर्फ डिग्री देकर विदा नहीं किया जा सकता। डिग्रीधारी नौजवान नौकरी खोज सकता है, लेकिन संविधान समझ चुका नौजवान जवाब मांगता है।
डिग्री लेने आए थे, अब संविधान का हिसाब लेने लगे हैं।
सत्यमेव जयते।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
