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कपिल सिब्बल की ढाई घंटे की दमदार दलीलें…आयोग ने पहले ही तय कर रखा था फैसला!

-दस्तावेजों पर हस्ताक्षर, मुहर दिखाकर पक्षपात का किया पर्दाफाश

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को दल और निशान देने का पैâसला पहले ही तय कर रखा था। वैसा विशिष्ट निष्कर्ष निकालने के लिए २०१८ के पार्टी संविधान की सहूलियत से अनदेखी की गई और तर्क को तोड़ा-मरोड़ा गया। जिस पार्टी का दूसरा संविधान अस्तित्व में है, ये बात जो आयोग १३ वर्षों में नहीं समझ सका, वही आयोग लचर दावे कर रहा है, ऐसी दमदार दलीलें वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कल सर्वोच्च न्यायालय में दीं। इसी दौरान दस्तावेजों पर ४ अप्रैल २०१८ की तारीख और उस तारीख की आयोग की आधिकारिक मुहर-हस्ताक्षर अदालत को दिखाकर आयोग के पक्षपात की कलई खोल दी।
‘दस्तावेज सामने थे, फिर भी आयोग ने नहीं देखा’
शिवसेना दल और निशान का मामला साथ ही गद्दार विधायकों की अयोग्यता से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम सुनवाई जारी है। इस मामले में सिब्बल ने बुधवार को लगातार दूसरे दिन चुनाव आयोग की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली का पर्दाफाश किया। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, पार्टी के आंतरिक बदलावों से संबंधित जानकारी चुनाव आयोग को आवश्यक होती है। उसके अनुसार, हमने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पदाधिकारियों के नाम सूचित किए थे। कानून के अनुसार आवश्यक चीजों की पूर्ति हमने की, फिर भी आयोग अपने पास अद्यतन पार्टी संविधान उपलब्ध न होने का सहूलियत भरा दावा करता है। सभी उपनेता मनोनीत होते हैं, ऐसा आयोग का कहना है। परंतु वास्तव में वे चुने हुए होते हैं। आयोग कागजातों को ठीक से देखता भी नहीं। १२ उपनेता मनोनीत किए गए थे और २१ लोग चुने गए थे, यह बताते हुए सिब्बल ने दस्तावेजों पर आयोग की आधिकारिक मुहर-हस्ताक्षर की ओर ध्यान आकर्षित किया। दस्तावेज पर चुनाव आयोग की खुद की आधिकारिक मुहर है। ४ अप्रैल २०१८ की तारीख को सीधे उप चुनाव आयुक्त के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। ऐसा होते हुए वे कागजात बाद में तैयार किए गए, ऐसा दावा वैâसे किया जा सकता है? हमने मनोनीत किए गए और चुने गए ऐसे सभी सदस्यों के नाम आयोग को सूचित किए थे। पार्टी का संविधान भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया था, यह स्पष्ट करते हुए सिब्बल ने चुनाव आयोग के पक्षपात की पोल खोली।
आयोग ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन किया है
सिब्बल ने चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए। किसी भी संस्था या अदालत को अधिकार का इस्तेमाल करने से पहले उनके पास मूल रूप से अधिकार क्षेत्र होना आवश्यक है। किसी राजनीतिक दल में टूट होने की बात प्रथम दृष्टया स्पष्ट होती है, तभी उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों पर विचार किया जा सकता है। लेकिन शिवसेना के मामले में चुनाव आयोग ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा २९-ए के तहत अपने अधिकारों का उल्लंघन किया है, ऐसा दावा सिब्बल ने किया।
पार्टी में टूट सिद्ध करने वाले कौन-से दस्तावेज थे?
८ अगस्त २०२२ को याचिकाकर्ताओं के वकीलों की ओर से चुनाव आयोग को कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज प्राप्त हुए थे। उसमें पार्टी के आंतरिक समर्थन को दर्शाने वाले हलफनामे और सूचियां शामिल थीं, ऐसा पीठ ने उल्लेख किया। उस पर सिब्बल ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। १९ जुलाई को पार्टी में टूट होने की बात सिद्ध करने के लिए आयोग के पास आखिर कौन-से दस्तावेज उपलब्ध थे, ऐसा सवाल सिब्बल ने किया। चुनाव आयोग को पार्टी के पदाधिकारियों की अद्यतन सूची भेजी थी। उस पत्राचार में ‘शिवसेनापक्षप्रमुख’ का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। इसके बावजूद इसी मुद्दे को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है।
हमने कानून के अनुसार अपनी जिम्मेदारी पूरी की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने यह सुविधाजनक रुख अपनाया कि हमारे पास पार्टी विधान की नई प्रति उपलब्ध नहीं है। शिवसेना के उपनेताओं का चयन लोकतांत्रिक तरीके से हुआ था, फिर भी आयोग ने उन्हें ‘नामित’ मान लिया। वास्तव में आयोग ने हमारे द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की साधारण जांच तक नहीं की।

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
-यदि पार्टी की संरचना या नियमों में कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ है, तो उसे दोबारा दोहराकर चुनाव आयोग को सूचित करने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं होती।
-यदि चुनाव आयोग को इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार ही नहीं था, तो आगे की किसी भी बात की जांच नहीं की जा सकती, लेकिन यदि आयोग को हस्तक्षेप करने का अधिकार था और उसका गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया, तो यह पूरी तरह अलग मामला है।
`हम महत्वाकांक्षाओं से भरे भारत में जी रहे हैं’ : सिब्बल
दलीलों के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने लोकतंत्र के बारे में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हम एक जीवंत लोकतंत्र में काम कर रहे हैं, यह बात भूलनी नहीं चाहिए, ऐसा न्यायमूर्ति ने कहा। उस पर सिब्बल ने अपने खास अंदाज में जवाब दिया। मौजूदा व्यवस्था कितनी लोकतांत्रिक बची है यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन हम महत्वाकांक्षाओं से भरे भारत में जी रहे हैं, इतना तो निश्चित है, ऐसा सिब्बल ने व्यक्त किया।

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