सामना संवाददाता / मुंबई
विरार-डहाणू के बीच तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने की योजना भले ही रफ्तार पकड़ने का दावा रेलवे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी मुश्किलों से भरी है। करीब ३,५७८ करोड़ रुपए की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना में निर्माण सामग्री को मौके तक पहुंचाना ही बड़ी चुनौती बन गया है। दलदली जमीन और नदी के बीच फंसे निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अब रेलवे को रो-रो ट्रॉली सिस्टम का सहारा लेना पड़ रहा है।
परियोजना के तहत सड़क मार्ग से जहां पहुंचना संभव नहीं है, वहां ट्रॉली के जरिए भारी मशीनरी और निर्माण सामग्री को रेल पुल तक ले जाया जा रहा है। भारतीय रेल में पहली बार इस तकनीक के इस्तेमाल का दावा किया गया है। सवाल यह है कि जिस परियोजना को २०२८ तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, उसके निर्माण की शुरुआत ही इतनी कठिन परिस्थितियों में हो रही है तो निर्धारित समय सीमा तक काम पूरा करना कितना चुनौतीपूर्ण होगा?
रेलवे के अनुसार, रो-रो ट्रॉली की क्षमता करीब ७० मीट्रिक टन है और निर्माण कार्य के दौरान यह लगभग ५० मीट्रिक टन तक भार ले जा सकती है। करीब आठ मीटर लंबी और तीन मीटर चौड़ी ट्रॉली के जरिए कंक्रीट तथा मिट्टी से संबंधित सामग्री को डेडिकेटेड प्रâेट कॉरिडोर के मौजूदा पुल के ऊपर से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा रहा है। ट्रॉली पुल पर चलती है और सामग्री को रोल-ऑन, रोल-ऑफ तरीके से लोड-अनलोड किया जाता है।
दो पुलों के बीच सड़क तक पहुंचना भी मुश्किल
इस तकनीक की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि पुल क्रमांक ९२ उत्तर और ९३ दक्षिण के बीच का क्षेत्र पूरी तरह दलदली है। इस हिस्से में न तो सड़क मौजूद है और न ही नदी के तल तक सामान्य रास्ते से पहुंचना आसान है। ऐसे में निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए अपनाया गया यह तरीका परियोजना की जटिलता को उजागर करता है। रेलवे इसे तकनीकी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि दलदली और दुर्गम भूभाग के कारण परियोजना के सामने समय, लागत और निर्माण प्रबंधन की चुनौती बनी हुई है। २०२८ की समय सीमा नजदीक आने के साथ अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि इन बाधाओं के बावजूद तीसरी-चौथी रेल लाइन का काम कितनी तेजी से जमीन पर उतरता है।
