मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: जिस घर में बहू कमाने जाती है वहां खाना कौन बनाए?

फलसफा: जिस घर में बहू कमाने जाती है वहां खाना कौन बनाए?

सना खान

सुबह के आठ बज रहे थे। नेहा बच्चों के टिफिन तैयार कर रही थी और बीच-बीच में अपने फोन पर ऑफिस के संदेश देख रही थी। ‘आज मेरी ९ बजे की मीटिंग है,’ उसने घड़ी देखते हुए कहा। पति ऑफिस के लिए निकल चुके थे। बच्चे स्कूल की तैयारी में थे। किसी तरह नाश्ता और टिफिन तैयार करके नेहा भी घर से निकल गई। ऑफिस पहुंचते ही मीटिंग शुरू हो गई। दोपहर में फोन पर घर से संदेश आया कि शाम को सब्जी लेते आना। रात का खाना भी बना देना। नेहा कुछ सेकंड तक स्क्रीन देखती रही। सुबह की भागदौड़ खत्म नहीं हुई थी कि दूसरी पारी शुरू हो चुकी थी।
आंकड़े जो कहानी कहते हैं
भारत सरकार के ऊग्स ळो एल्rनब् २०२४ के अनुसार, बिना वेतन वाले घरेलू काम में ८१.५ प्रतिशत महिलाएं हिस्सा लेती हैं, जबकि पुरुषों की हिस्सेदारी २७.१ प्रतिशत है।
घरेलू काम करने वाली महिलाएं औसतन २८९ मिनट यानी करीब ४ घंटे ४९ मिनट प्रतिदिन देती हैं। पुरुषों का औसत ८८ मिनट यानी करीब १ घंटा २८ मिनट है। भोजन तैयार करने और उससे जुड़े काम में महिलाएं औसतन २०९ मिनट, जबकि पुरुष ८७ मिनट देते हैं।
तस्वीर का एक और पहलू
जुलाई २०२६ में सामने आए एक राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वेक्षण के अनुसार, दस लाख से अधिक आबादी वाले भारत के ४६ बड़े शहरों में लगभग ६९ प्रतिशत महिलाओं ने बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों को श्रमबल से बाहर रहने का कारण बताया।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि महिलाएं काम क्यों नहीं कर रही हैं। सवाल यह भी है कि काम करने के बाद घर की दूसरी पारी का बोझ आखिर किसके हिस्से में आता है?
नौकरी के साथ घर की दूसरी पारी
आज महिलाएं परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। वे नौकरी करती हैं, कारोबार संभालती हैं और नेतृत्व की भूमिकाओं में आगे बढ़ रही हैं। फिर भी घर पहुंचने के बाद उनसे अक्सर वही पुरानी उम्मीद जुड़ी रहती है कि क्या खाना तैयार है। पति देर से आए तो वजह होती है, ऑफिस का काम। पत्नी देर से आए तो सवाल बन जाता है, घर का काम। यहीं असली दोहरा मापदंड दिखाई देता है। मुद्दा खाना बनाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि घरेलू काम को अब भी महिला की स्वाभाविक जिम्मेदारी क्यों माना जाता है?
बराबरी का मतलब क्या है?
हर काम का बिल्कुल ५०-५० बंटवारा संभव नहीं होता। कभी एक व्यक्ति ज्यादा काम करेगा, कभी दूसरा। लेकिन अगर दोनों कमाते हैं, तो घर भी दोनों का है और उसकी जिम्मेदारियां भी साझी होनी चाहिए। कभी पति खाना बना सकता है, कभी पत्नी। कभी बाहर से खाना मंगाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर घरेलू मदद ली जा सकती है। समाधान हमेशा बराबर हिस्सों में नहीं, बराबर सम्मान में है।
उस रात नेहा घर लौटी तो थकी हुई थी। वह रसोई की तरफ बढ़ी ही थी कि उसके पति ने कहा, ‘आज तुम आराम करो। खाना मैं बना लेता हूं।’ नेहा मुस्कुराई। शायद उस दिन सिर्फ रात का खाना नहीं बना था। घर के भीतर जिम्मेदारियों को देखने का नजरिया भी थोड़ा बदला था। क्योंकि अगर महिला की कमाई परिवार की है, तो उसकी मेहनत भी परिवार की है। और घर किसी एक की ड्यूटी नहीं, साझेदारी है।

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