मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: मंच अशुद्ध हुआ या सोच?

रुख-ए-सियासत: मंच अशुद्ध हुआ या सोच?

तौसीफ कुरैशी

-लोकतंत्र में किसी की जाति उसके नागरिक अधिकारों का पैमाना नहीं हो सकती। सबसे बड़ा दुख यह है कि ऐसी घटनाएं अक्सर बड़े नामों से जुड़ने पर ही खबर बनती हैं।
-खड़गे के बाद ‘शुद्धिकरण’ पर उठे तीखे सवाल
हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद मंच का कथित ‘शुद्धिकरण’ कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं है। यह उस मानसिकता का आईना है, जिसमें आदमी की जाति मंच से उतरने के बाद भी उसके साथ चलती रहती है। खड़गे ने किसी जाति या धर्म का नाम लिए बिना जनता की समस्याओं पर भाषण दिया, लेकिन उनके जाने के बाद उसी मंच पर हवन करके उसे ‘शुद्ध’ किया गया। सवाल यह नहीं है कि हवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा से जुड़े नेताओं ने किया। सवाल यह है कि किस चीज को अशुद्ध समझा गया? टीकाराम जूली की घटना याद आती है। राजस्थान के नेता प्रतिपक्ष एक मंदिर में गए और उनके लौटने के बाद भाजपा के पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहुजा ने मंदिर को गंगाजल से शुद्ध किया। तब भी सवाल यही था कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के स्पर्श से मंदिर अपवित्र कैसे हो गया? उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री आवास खाली करने के बाद उसके कथित गंगाजल से शुद्धिकरण की तस्वीरें भी इसी सामाजिक सोच की तरफ इशारा करती थीं। यह वही विचारधारा है, जो नफरत की खेती करती आई है, यही उसकी पहचान बनी हुई है।
इन घटनाओं में एक समान धागा है कि व्यक्ति नहीं बदला, सत्ता बदल गई, सत्ता नहीं बदली, तो जाति की सीढ़ी वही रही। विडंबना देखिए कि संसद में सामाजिक न्याय की बातें होती हैं, संविधान की दुहाई दी जाती है और यही विचारधारा मंचों से छुआछूत को अपराध बताने का ढोंग करती है। लेकिन समाज के भीतर अगर किसी दलित नेता के भाषण के बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत महसूस की जाती है तो फिर सवाल केवल कानून का नहीं, संस्कार का है। खड़गे ने कहा है कि उन्हें ‘ळहूदल्म्प्aंग्त्ग्ूब्’ का एहसास कराया गया और मांग की कि दोषियों पर कानून के तहत मुकदमा हो। उनकी यह मांग राजनीतिक बदले की मांग नहीं, बल्कि कानून के सामने बराबरी की मांग होनी चाहिए। वास्तव में ऐसा हुआ है तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में किसी की जाति उसके नागरिक अधिकारों का पैमाना नहीं हो सकती। सबसे बड़ा दुख यह है कि ऐसी घटनाएं अक्सर बड़े नामों से जुड़ने पर ही खबर बनती हैं। गांव-कस्बों में कितने लोगों को कुएं, मंदिर, दुकान, भोजन और बैठने की जगह तक में भेदभाव झेलना पड़ता है, उसका हिसाब कौन रखता है? कितने लोग अपमान को अपनी किस्मत मानकर चुप रह जाते हैं? और इससे भी बड़ा सवाल दलितों-पिछड़ों से है। जो लोग उनके अपमान को देखते हैं, वही कभी-कभी उस राजनीति को वोट भी देते हैं, जो ऐसे भेदभाव के खिलाफ निर्णायक सामाजिक लड़ाई लड़ने से बचती है।
राजनीति में समर्थक होना अलग बात है, नागरिक अधिकारों पर सवाल करना अलग। लोकतंत्र में किसी नेता का समर्थक होने का अर्थ अपने सम्मान का समर्थक होना छोड़ देना नहीं है। गांधी ने छुआछूत को मानवता के विरुद्ध अपराध माना था। संविधान ने अस्पृश्यता को कानूनन अपराध बनाया। फिर भी अगर किसी के जाने के बाद मंच को शुद्ध करना जरूरी समझा जाता है तो समझिए कि संविधान किताब में आगे निकल गया है और समाज का एक हिस्सा अभी भी मनुष्य को उसकी जाति में खोज रहा है। इसलिए हल्द्वानी में सिर्फ मंच की जांच नहीं होनी चाहिए। इस घटना के बहाने उस मानसिकता की भी जांच होनी चाहिए जो किसी मनुष्य के स्पर्श को अपवित्र और किसी दूसरे के स्पर्श को पवित्र मानती है। मंच को गंगाजल से धोने वालों को शायद पता नहीं कि मंच पर धूल नहीं लगी थी, लोकतंत्र के चेहरे पर सवाल लगा था। अब जरूरत मंच के शुद्धिकरण की नहीं, मानसिकता के शुद्धिकरण की है। सत्यमेव जयते

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