मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: मोदी के सामने लाल किले की `अग्निपरीक्षा'!

पॉलिटिका: मोदी के सामने लाल किले की `अग्निपरीक्षा’!

के.पी. मलिक
-राहुल के वार के बीच बदलेगा नैरेटिव?
-मोदी के सामने विकल्प बहुत साफ हैं वे राहुल गांधी के आरोपों की राजनीति में उतरकर जवाब दें, या उससे ऊपर उठकर ऐसा राष्ट्रीय नैरेटिव प्रस्तुत करें, जिसमें विपक्ष के सवालों का उत्तर भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो।

स्वतंत्रता दिवस यानी १५ अगस्त के दिन लाल किला भारतीय राजनीति में केवल सरकारी उपलब्धियों का मंच नहीं होता। प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन सत्ता की प्राथमिकताओं, भविष्य की दिशा और कई बार आने वाले राजनीतिक संघर्षों का संकेत भी देता है। इस बार यह मंच इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद का मानसून सत्र १३ अगस्त को समाप्त हो चुका है और उसके अंतिम दिनों में सरकार तथा विपक्ष के बीच टकराव खास तौर पर तीखा रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी १५ अगस्त को उन राजनीतिक विवादों को सीधे संबोधित करेंगे, जिनको लेकर राहुल गांधी लगातार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर ले रहे हैं? राहुल गांधी ने छात्र प्रदर्शन से जुड़े पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर अमित शाह से जवाब और यहां तक कि उनके इस्तीफे की मांग की है। सरकार की ओर से अमित शाह ने संसद में चर्चा की पेशकश की, लेकिन विपक्ष ने इसे पर्याप्त नहीं माना।
यहीं से प्रधानमंत्री के सामने असली राजनीतिक चुनौती शुरू होती है। अगर लाल किले से मोदी सीधे राहुल गांधी और विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हैं, तो विपक्ष को यह कहने का अवसर मिल सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय मंच को राजनीतिक विवादों के जवाब का मंच बना दिया गया। लेकिन यदि प्रधानमंत्री पूरी तरह मौन रहते हैं, तो विपक्ष इसे इस रूप में पेश कर सकता है कि जिन सवालों पर संसद में सरकार असहज रही, उनसे प्रधानमंत्री ने दूरी बना ली। इसलिए अधिक संभावित रणनीति सीधे जवाब देने के बजाय नैरेटिव बदलने की हो सकती है। दरअसल, सरकार के लिए यह अवसर है कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की जमीन से चर्चा को युवाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, विकास, रोजगार, तकनीक और २०४७ के भारत की ओर ले जाए।
इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह की आधिकारिक थीम भी ‘युवा शक्ति फॉर विकसित भारत २०४७’ रखी गई है और २०२६ में ‘वंदे मातरम’ के १५० वर्ष पूरे होने के अवसर पर पहली बार लाल किले की प्राचीर से इसके गायन की योजना है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल राष्ट्रीय उपलब्धियों और भविष्य के भारत की तस्वीर दिखा देने से वर्तमान राजनीतिक बेचैनी गायब हो जाएगी? शायद नहीं। क्योंकि राहुल गांधी का मौजूदा हमला केवल किसी एक मंत्री पर राजनीतिक आरोप नहीं है। वह उसे शासन, पुलिस कार्रवाई, युवाओं के अधिकार और सरकार की जवाबदेही के बड़े सवाल से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है कि अमित शाह को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाते हुए अंतत: राजनीतिक दबाव प्रधानमंत्री तक पहुंचाना। ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती केवल राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि विपक्ष का बनाया हुआ मुद्दा जनता के बीच सरकार की व्यापक छवि का हिस्सा न बन जाए।
यही कारण है कि अमित शाह की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि प्रधानमंत्री लाल किले से इन विवादों का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देते हैं, तो सरकार के भीतर यह जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से गृह मंत्रालय और भाजपा के राजनीतिक तंत्र पर आ जाती है। यानी मोदी राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका में रहेंगे और शाह राजनीतिक-प्रशासनिक जवाबदेही के मोर्चे को संभालेंगे। यही विभाजन सरकार के लिए अधिक सुविधाजनक हो सकता है। इसके साथ एक और तथ्य महत्वपूर्ण है। २०२६ का स्वतंत्रता दिवस केवल एक औपचारिक राष्ट्रीय समारोह नहीं है। यह देश का ८०वां स्वतंत्रता दिवस है और सरकार ने इसे ‘युवा शक्ति’ तथा विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने की तैयारी की है। लगभग ५ हजार विशेष अतिथियों को आमंत्रित किया गया है। इसलिए मोदी के सामने दो मंच एक साथ मौजूद हैं एक राजनीतिक और दूसरा राष्ट्रीय।
रोजगार, शिक्षा और लोकतंत्र: लाल किले से क्या जवाब देंगे मोदी?
राजनीतिक मंच पर राहुल गांधी लगातार सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। राष्ट्रीय मंच पर मोदी के पास भारत की दीर्घकालिक दिशा तय करने का अवसर है। यदि प्रधानमंत्री समझदारी से काम लेते हैं तो वे विपक्ष के हर आरोप का जवाब देने के बजाय यह संदेश दे सकते हैं कि सरकार की राजनीति तत्काल विवादों से बड़ी है। लेकिन इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भाषण केवल उपलब्धियों की सूची बनकर न रह जाए। क्योंकि आज देश का युवा केवल ‘विकसित भारत २०४७’ का सपना नहीं सुनना चाहता; वह यह भी जानना चाहता है कि आज की व्यवस्था में उसके सवालों की जगह कहां है। जिस समय छात्र सड़कों पर हैं, विपक्ष संसद में जवाब मांग रहा है और सरकार विपक्ष पर संसद बाधित करने का आरोप लगा रही है, उस समय लाल किले से ‘युवा शक्ति’ की बात तभी प्रभावी होगी, जब उसमें युवाओं की असहमति, रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों की चिंता भी दिखाई दे। यही १५ अगस्त की सबसे बड़ी परीक्षा है।
-मोदी के भाषण की असली परीक्षा
कौन-से सवाल उठेंगे, कौन-से दबेंगे?
दरअसल, मोदी के सामने विकल्प बहुत साफ हैं वे राहुल गांधी के आरोपों की राजनीति में उतरकर जवाब दें, या उससे ऊपर उठकर ऐसा राष्ट्रीय नैरेटिव प्रस्तुत करें, जिसमें विपक्ष के सवालों का उत्तर भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो। दूसरा विकल्प राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावी हो सकता है, क्योंकि प्रधानमंत्री का कद उन्हें हर आरोप का प्रत्यक्ष जवाब देने के बजाय देश की दिशा तय करने की स्थिति देता है। लेकिन लोकतंत्र में एक खतरा हमेशा रहता है कि नैरेटिव बदलना और सवाल का जवाब देना दो अलग-अलग चीजें हैं। यदि सरकार हर असहज सवाल को राष्ट्रवाद, विकास और भविष्य की उपलब्धियों के बड़े विमर्श में समाहित कर देगी, तो तत्काल राजनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन जवाबदेही का सवाल बना रहेगा। दूसरी ओर, विपक्ष अगर हर राष्ट्रीय उपलब्धि को राजनीतिक प्रचार बताकर खारिज करता रहेगा, तो वह भी जनता के भरोसे को मजबूत नहीं कर पाएगा। इसलिए १५ अगस्त का भाषण वास्तव में मोदी बनाम राहुल गांधी का भाषण नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह होगी कि प्रधानमंत्री सत्ता और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक लड़ाई से ऊपर उठकर राज्य और नागरिक के बीच भरोसे की लड़ाई को कितना समझ पाते हैं। लाल किले से प्रधानमंत्री को इस बार केवल यह नहीं बताना है कि भारत कहां पहुंचा है। उन्हें यह भी बताना होगा कि भारत किस दिशा में जा रहा है और उस यात्रा में असहमति रखने वाले युवा, सवाल पूछने वाला विपक्ष और जवाब मांगने वाला नागरिक किस स्थान पर खड़ा है। क्योंकि १५ अगस्त को लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण अगले दिन की सुर्खियां जरूर बनाता है, लेकिन उसकी असली परीक्षा आने वाले महीनों में होती है। इस बार सवाल यह नहीं कि मोदी क्या बोलेंगे। बड़ा सवाल यह है कि वे किन सवालों को बोलकर संबोधित करेंगे और किन सवालों को राष्ट्रीय नैरेटिव के भीतर दबा देंगे।

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