हरिगोविंद विश्वकर्मा
आपने कभी गाली खाई है। नहीं न… तब निश्चित रूप से आप गाली खाने के सुख से वंचित हैं। पहले किसी को कोई गाली दे देता था तो बवाल हो जाता था। कहने का मतलब गाली खाना अपमान माना जाता था। गाली खानेवाले व्यक्ति का चेहरा उतर जाता था। वह रूआंसा हो जाता था। उसे लगता था उसकी इज्जत चली गई। इसीलिए कई बार लोग गाली के बदले गाली देते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। अब गाली खाने से इज्जत नहीं जाती। अब तो गाली खाना उपलब्धि हो गई है। पब्लिक लाइफ में तो गाली खानेवाला व्यक्ति गर्व से कहता है, देखा, मुझे लोग गालियां दे रहे हैं। अब आप मेरी लोकप्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं।
लक्ष्मी जी सहाय!
गाली देनेवाला कम गाली खानेवाला ज्यादा चर्चा में आता है। जिसे कोई गाली नहीं देता, उसे कोई जानता भी नही। आजकल अच्छा काम करने से लोकप्रियता नहीं मिलती। गाली खाने से लोकप्रियता मिलती है। आप लाख ईमानदार हैं, अगर आपको गाली नहीं मिली तो आपकी ईमानदारी व्यर्थ है, क्योंकि आप गाली खाने के सुख से वंचित हैं। सोशल मीडिया पर जिसे लोग ज्यादा गाली देते हैं, उसका अकाउंट जल्दी मोनेटाइज होता है। गाली अपने साथ लोकप्रियता के साथ-साथ लक्ष्मी को भी लेकर आती है।
पहले गाली खाने के लिए गाली देनेवाले के सामने जाना पड़ता था। अब लोग घर बैठे गाली खाते हैं। यह सोशल मीडिया का कमाल है। इस माध्यम ने गाली खाने को आसान बना दिया है। आप बस मोबाइल उठाइए। कोई वीडियो बनाकर डाल दीजिए। थोड़ी ही देर में आपकी झोली में गालियां गिरनी शुरू हो जाएंगी। आप आराम से स्क्रीन पर तरह-तरह की गालियों का आनंद लीजिए।
जवाबदेही से मुक्ति!
गाली खाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि चमड़ी मोटी हो जाती है। जैसे-जैसे चमड़ी मोटी होती जाती है। वैसे-वैसे कॉन्फिडेंस बढ़ता है। एक समय ऐसा आता है कि गालियां टॉफी की तरह लगने लगती हैं। अगर टॉफियां मुंह में मिठास बढ़ाती हैं तो गालियां व्यक्तित्व में आत्मविश्वास डाल देती हैं। दरअसल, पहले आलोचना होती थी। अब गाली है। आलोचना का जवाब देना पड़ता था, लेकिन गालियों का कोई जवाब देने की जरूरत नहीं होती। यानी गालियां गाली खानेवाले को जवाबदेही से बचा लेती हैं।
लोकप्रियता का पैमाना!
अब तो गाली खाने का सुख ज्यादा लोग टेस्ट कर चुके हैं। कुछ लोग तो गाली खाने में गजब के निपुण हैं। उन्हें गाली न मिले तो बेचैनी होने लगती है। सोचते हैं कि अब गाली क्यों नहीं मिल रही है? कहीं लोकप्रियता कम तो नहीं हो रही? ऐसे लोग सुबह उठकर सबसे पहले सोशल मीडिया देखते हैं। गालियों की संख्या कम होने पर चिंतित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि जनता उदासीन हो गई है। जनता की उदासीनता तो गाली से भी ज्यादा खतरनाक है। इसलिए जनता कभी उदासीन नहीं होनी चाहिए। तो जनता को गाली देने के लिए उकसाते रहना चाहिए।
सफलता की जननी
इसलिए अगर आपको जीवन में आगे बढ़ना है तो गाली खाने का अभ्यास शुरू कर दीजिए। पहले एक-दो गालियों से शुरुआत करें। फिर पांच गालियां। तदुपरांत दस गालियां। उसके बाद बीस गालियां। पचास गालियां और फिर गालियों का शतक! जिस दिन आपने गालियां खाने का शतक बनाया, उसे दिन आप सीजन्ड व्यक्ति हो जाएंगे। आपको किसी से डर ही नहीं लगेगा, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा आदमी क्या कर सकता है? जाहिर है वह गाली दे सकता है, लेकिन गाली तो आपके लिए मलाई-बरफी की तरह है। आराम से डाइजेस्ट कर लेंगे। हां, गाली खाने के बाद वीडियो बनाइए और जनता को बताइए कि आपको गाली दी जा रही है। इस तरह आप गालियां खाने का सुख इन्जॉय कीजिए। हां, ध्यान रखिए, ऐसा कुछ करते रहिए ताकि लोग गाली देते रहें। हां, यह भी ध्यान रखें कि लोग आपको गाली देना बंद न करें। क्योंकि जिस दिन गालियां बंद हो गईं, उसी दिन आपकी लोकप्रियता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए गाली खाते रहें, लोकप्रिय होते रहें और गाली खाने के सुख का आनंद लेते रहें।
