-सरकारी कंटेंट हटाने की मांगों पर मस्क का जोर
-लोगों को पता चले किसने किस पोस्ट पर लगवाई रोक
एलन मस्क ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी सेंसरशिप के मुद्दे को बहस के केंद्र में ला दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पहले से ही सरकारों की ओर से आने वाली कंटेंट हटाने या रोकने संबंधी कानूनी मांगों के आंकड़े अपने ट्रांसपेरेंसी सेंटर में जारी करता है। अब मस्क ऐसी सरकारी मांगों को और ज्यादा सार्वजनिक तथा पारदर्शी बनाने पर जोर दे रहे हैं। सवाल सीधा है, अगर कोई सरकार किसी पोस्ट, अकाउंट या विचार को जनता की नजरों से हटाना चाहती है, तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि आदेश किसने दिया और किस आधार पर दिया? यही पारदर्शिता सेंसरशिप और वैध कानूनी कार्रवाई के बीच का फर्क भी सामने ला सकती है। सरकार यदि राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंसा, अपराध या किसी स्पष्ट कानून के तहत सामग्री हटवाती है तो वह अपना आधार सार्वजनिक रूप से बता सकती है।
लेकिन अगर आलोचना दबाने या असहज सवालों से बचने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दबाव डाला जा रहा हो, तो उसका रिकॉर्ड भी जनता के सामने होना चाहिए। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि एक्स हर सरकारी टेकडाउन आदेश की पूरी प्रति सार्वजनिक करने जा रहा है। कंपनी आधिकारिक रूप से हटाने की कानूनी मांगों और अनुपालन से जुड़े आंकड़े जरूर प्रकाशित करती है। फिर भी सिद्धांत महत्वपूर्ण है, सेंसरशिप अगर कानून के नाम पर हो रही है तो कानून और आदेश दोनों रोशनी में होने चाहिए, अंधेरे में नहीं। और यह नियम केवल एक्स तक सीमित क्यों रहे? फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब समेत हर बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को बताना चाहिए कि किस सरकार ने कौन-सी सामग्री हटाने को कहा और प्लेटफॉर्म ने उस मांग पर क्या कार्रवाई की। लोकतंत्र में पोस्ट हट सकती है, लेकिन उसे हटाने वाले हाथ पर पर्दा नहीं होना चाहिए।
