सना खान
कभी ऑफिस में शुरू होने वाली दोस्ती दफ्तर की चहारदीवारी तक सीमित रहती थी, लेकिन मोबाइल ने रिश्तों की यह सीमा काफी हद तक मिटा दी है। सुबह ऑफिस पहुंचने से पहले संदेश, दिनभर छोटी-छोटी बातें और रात तक चलने वाली बातचीत कई बार पेशेवर रिश्ते को निजी नजदीकी में बदल देती है।
रिया और अमित एक ही कंपनी में काम करते थे और दोनों शादीशुदा थे। शुरुआत काम से जुड़ी बातचीत से हुई। धीरे-धीरे चर्चा निजी जिंदगी, परेशानियों और भावनाओं तक पहुंच गई। ऑफिस खत्म होने के बाद भी दोनों की बातचीत जारी रहने लगी। यहीं से दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव के बीच की सीमा धुंधली होने लगी।
हर निजी बातचीत अफेयर नहीं होती। सहकर्मियों के बीच दोस्ती स्वाभाविक है। लेकिन लगातार निजी संदेश, देर रात बातचीत, किसी एक सहकर्मी से भावनाएं साझा करना और उसके जवाब का इंतजार करना यह संकेत दे सकता है कि रिश्ता सामान्य पेशेवर दोस्ती से आगे बढ़ रहा है।
मुंबई जैसे महानगर में लोग घंटों सफर और ऑफिस में बिताते हैं। ऐसे में सहकर्मी कई बार परिवार के बाद सबसे ज्यादा समय साथ बिताने वाला व्यक्ति बन जाता है।
मोबाइल ने लोगों को करीब आने की सुविधा दी है, लेकिन रिश्तों की सीमा तय करने की जिम्मेदारी अब भी इंसान की ही है।
