-कैग की रिपोर्ट ने खोली रेलवे की ‘स्वच्छता’ और यात्री सुविधाओं की पोल
उमन गुप्ता
रेलवे स्टेशनों को आधुनिक बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। कहीं विश्वस्तरीय स्टेशन का सपना दिखाया जा रहा है, कहीं करोड़ों-अरबों की परियोजनाओं का उद्घाटन हो रहा है, लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी वैâग की ताजा रिपोर्ट ने इन चमकदार दावों के पीछे की गंदगी सामने ला दी है। सवाल सीधा है कि जिस यात्री से टिकट का पूरा पैसा वसूला जाता है, उसे पीने के लिए साफ पानी तक क्यों नहीं मिल रहा।
वैâग ने ५१२ गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों की जांच की और पाया कि इनमें ४५८ स्टेशन यानी ८९ प्रतिशत से अधिक स्टेशन न्यूनतम जरूरी यात्री सुविधाओं के मानकों पर खरे नहीं उतरे। इन सुविधाओं में पीने का पानी, शौचालय, यूरिनल, बैठने की व्यवस्था, प्लेटफार्म शेड, पंखे, डस्टबिन और अन्य बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं।, लेकिन इस रिपोर्ट का सबसे भयावह हिस्सा है पीने के पानी में ई. कोली बैक्टीरिया का मिलना। वैâग के मुताबिक, आठ रेलवे स्टेशनों के
वॉटर कूलर के नमूनों में ई. कोली पाया गया। इनमें छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, भिवंडी रोड, कल्याण और लोनावला जैसे स्टेशन भी शामिल हैं। यानी जिस पानी को यात्री गर्मी में राहत समझकर पी रहा है, वही उसकी सेहत के लिए खतरा बन सकता है।
मुंबई की ‘शान’ सीएसएमटी भी सवालों के घेरे में
मुंबई के लिए यह रिपोर्ट विशेष रूप से शर्मनाक है। सीएसएमटी केवल रेलवे स्टेशन नहीं, मुंबई की पहचान है, लेकिन इसी स्टेशन के वॉटर कूलर के पानी के नमूने में ई. कोली पाया गया।
वैâग की जांच में बड़े स्टेशनों पर भी बैठने की जगह, शौचालय, डस्टबिन और दूसरी मूलभूत सुविधाओं में कमियां सामने आर्इं। रेलवे बोर्ड ने २०१८ में आदेश दिया था कि सभी स्टेशनों पर न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और इसके लिए ३१ अगस्त २०१८ की समयसीमा तय की गई थी। आठ साल बाद भी यदि ५१२ में से ४५८ स्टेशन इन बुनियादी मानकों से पीछे हैं, तो सवाल रेलवे की योजना का नहीं, उसकी निगरानी और जवाबदेही का है।
कागज पर सुविधा, जमीन पर कमी!
कैग की रिपोर्ट बताती है कि यात्री सुविधाओं की सूची लंबी है, लेकिन कमी उससे भी लंबी। कई स्टेशनों पर शौचालय, यूरिनल, पानी के नल और बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं मिली। पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच को लेकर भी गंभीर खामियां सामने आर्इं। यहां सवाल केवल गंदगी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो करोड़ों यात्रियों को रोज सेवा देने का दावा करती है। रेलवे देश की जीवनरेखा है। २०२३-२४ में गैर-उपनगरीय रेलवे नेटवर्क ने करीब २९२.४ करोड़ यात्रियों को ढोया। इतनी बड़ी आबादी की जिम्मेदारी उठाने वाली व्यवस्था में यदि पीने का पानी ही संदिग्ध हो जाए तो इसे सामान्य प्रशासनिक चूक कहकर टाला नहीं जा सकता।
‘अमृत स्टेशन’ की चमक और यात्री की प्यास
रेलवे स्टेशनों के कायाकल्प के बड़े अभियान चल रहे हैं। स्टेशन की इमारत चमक रही है, नए बोर्ड लग रहे हैं, आधुनिक सुविधाओं की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं, लेकिन कैग पूछ रहा है, क्या विकास का मतलब केवल चमकती इमारत है?
यात्री को सबसे पहले चाहिए साफ पानी, साफ शौचालय, बैठने की जगह और सुरक्षित प्लेटफार्म। यदि इन बुनियादी जरूरतों पर ही व्यवस्था विफल है तो फिर करोड़ों की सजावट किस काम की? वैâग ने रेलवे को पानी की आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी मजबूत करने और निर्धारित मानकों के अनुसार, पीने के पानी की व्यापक जांच करने की सलाह दी है। रेलवे को अब विज्ञापन नहीं, जवाब देना होगा। क्योंकि यात्री केवल टिकट खरीदकर ट्रेन में नहीं बैठता, वह अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी रेलवे को सौंपता है और यदि स्टेशन का पानी ही बीमारी बांटने लगे तो फिर ‘विकास’ के दावों की चमक पर सवाल उठना स्वाभाविक है। रेलवे से अब यही सवाल है कि यात्री को ‘विश्वस्तरीय स्टेशन’ चाहिए या सबसे पहले एक गिलास सुरक्षित पानी?
