शीतल अवस्थी
वैसे तो सांप एक सामान्य जीव है, लेकिन देवता के रूप में पांच सर्पों का उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। अहिबुद्घ नामक नाग की पूजा का प्रमाण ऋग्वेद में मिलता है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखित है कि यमुना नदी में एक भयंकर जहरीला विशाल कालिया नाग रहता था। उसके विष से नदी का जल ही नहीं, आस-पास के पेड़-पौधे, वनस्पतियां, मिट्टी तक विषैली हो गयी थी। जनता उसके आतंक से पीड़ित थी। लोगों की प्रार्थना पर भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पकड़ कर दूसरे स्थान पर पहुंचा दिया और हिदायत दी कि दुबारा इस नदी में न दिखाई दे। कालिया से मुक्ति के उपलक्ष्य में नागपंचमी का पर्व मनाया जाने लगा। कहा जाता है कि एक बार नागराज तक्षक ने सम्राट परीक्षित को डस लिया। इससे उनका पुत्र जनमेजय बहुत क्रोधित हुआ। तक्षक से अपने पिता का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। वह सभी नागों को जीवित ही यज्ञाग्नि में जलाने लगा। एक का कुकृत्य और सभी लोग भुगतें, यह अनुचित कार्य देवर्षि नारद से न देखा गया, तब वे सम्राट जनमेजय के पास पहुंचे और उसे भलीभांति समझाया इससे जनमेजय को अपनी गलती पर एहसास हुआ। प्रायश्चित स्वरूप उसने नागों की पूजा की। मान्यता है कि उसी दिन से प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागपंचमी मनाई जाने लगी।
नागपंचमी का संबंध लोक-कथाओं से भी जोड़ा जाता है। लोक प्रसिद्ध कथा है कि एक गांव में एक किसान के सात बेटे और सात बहुएं थीं। इनमें से छोटी बहू का कोई मायका नहीं था, इससे वह तीज-त्योहारों पर काफी दुःखी हो जाती थी। उस पर तरस खाकर श्रावण के महीने में एक दिन शेषनाग उस किसान के घर आए और खुद को उसका दूर का रिश्तेदार बताया। विश्वास कर किसान ने छोटी बहू को शेषनाग के साथ भेज दिया। छोटी बहू शेषनाग के घर में आनंद से रहने लगी। एक दिन भूल से एक जलता हुआ दीपक शेषनाग के दो बच्चों पर गिर पड़ा, जिससे बच्चों की पूंछ कट गई। शेषनाग कुछ न बोले और छोटी बहू को उसकी ससुराल पहुंचा दिया। जब शेषनाग के बच्चे बड़े हुए और उनकी पूंछ कटने की बात उनको मालूम हुई तो वे दोनों छोटी बहू को डसने के लिए किसान के घर में चुपके से आ पहुंचे। यहां उन्होंने देखा, छोटी बहू अपने नाग भाइयों के कल्याण की कामना कर रही है। इससे वे दोनों नाग के बच्चे अति प्रसन्न होकर अपनी बहन छोटी बहू को उपहार स्वरूप बहुमूल्य मणिमाला देकर बिदा हुए। उस दिन श्रावण माह की शुक्ल पंचमी थी। कहते हैं, उस दिन से नाग-पंचमी मनाने की परंपरा चल पड़ी।
एक अन्य लोक-कथा के अनुसार, एक किसान की बैलगाड़ी से कुचल कर एक सांप का बच्चा मर गया, जिसका बदला लेने के लिए नाग किसान के घर गया। किसान सांप के बच्चों को दूध पिला रहा था, जिसे देख नाग ने अपना इरादा बदल डाला और उसे माफ कर दिया। वह दिन श्रावण पंचमी का था। मान्यता है, उसी दिन से नाग-पूजा की परंपरा चल रही है। इस तरह अनेकानेक लोक-कथाएं, लोक-मान्यताएं, लोक-विश्वास और लोक-किंवदंतियां हैं, जो मनुष्य और नाग के संबंध को प्रकट करती हैं।
