मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है : ‘हम साथ हैं, लेकिन हमें हल्के में मत लेना!

गजबे है : ‘हम साथ हैं, लेकिन हमें हल्के में मत लेना!

-संजय निषाद के अल्टीमेटम ने बढ़ाया भाजपा का टेंशन

उमा सिंह

यूपी की सियासत में चुनाव अभी आया भी नहीं और कुर्सी की चिंता अभी से शुरू हो गई। संजय निषाद ने मंच से बीजेपी को साफ-साफ चेतावनी दे दी है कि अगर निषाद समाज की बात नहीं सुनी, तो बीजेपी भी सत्ता से बाहर हो सकती है। राजनीति भी गजब है। सरकार में मंत्री भी रहिए, सत्ता का हिस्सा भी बनिए और फिर उसी सत्ता को बाहर का रास्ता दिखाने की धमकी भी दीजिए। इसे गठबंधन धर्म कहें या ‘दबाव बनाओ, अपना हिसाब पक्का कराओ’ वाली राजनीति?
बता दें कि संजय निषाद की आरक्षण की मांग पुरानी है और उनका कहना है कि जब तक निषाद समाज को उसका हक नहीं मिलेगा, संघर्ष जारी रहेगा। मुद्दा गंभीर है, लेकिन बयान का टाइमिंग और अंदाज अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश है। २०२७ करीब है। अब हर सहयोगी को अपनी ताकत दिखाई दे रही है। कोई वोट बैंक गिन रहा है, कोई सीटें, कोई आरक्षण और कोई सत्ता में हिस्सेदारी। बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष की नहीं, अपने ही सहयोगियों की बढ़ती उम्मीदों की भी है। सबसे चौंकानेवाली बात तो यह है कि निषाद जी ने सपा, बसपा और कांग्रेस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन्होंने उनकी बात नहीं सुनी, वे सत्ता से बाहर हो गए। अब वे बीजेपी को भी वही चेतावनी दे रहे हैं। यानी संदेश साफ है, ‘हम साथ हैं, लेकिन हमें हल्के में मत लेना!’ अब भाजपा का भी टेंशन बढ़ गया है, सहयोगी को मनाए, मांग माने या फिर २०२७ के चुनावी गणित में नया समीकरण तलाशे? क्योंकि यूपी की राजनीति में कुर्सी का खेल बड़ा बेरहम है। आज मंत्री, कल चेतावनी और चुनाव के बाद पता चलेगा कि किसकी चली और किसकी कुर्सी हिली!

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