तौसीफ कुरैशी
बारह साल से जिस सत्ता के बारे में यह धारणा बनाई गई कि उसके सामने कोई खड़ा नहीं हो सकता। जिसके पास सत्ता की ताकत थी, जांच एजेंसियां थीं, पुलिस थी, प्रचार का विराट तंत्र था और डर का ऐसा माहौल था कि छोटे-मोटे लोग सहमकर किनारे हो जाते थे, उस सत्ता के सामने लगातार १२ साल से एक आदमी सीना तानकर खड़ा है। उसका नाम राहुल गांधी है और उसकी ताकत गांधीवाद है। गांधीवाद का मतलब यह नहीं कि आपके पास सत्ता कम हो और सामने वाले के पास ज्यादा। गांधीवाद का मतलब है कि सामने वाला कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, आप सच का सवाल पूछना बंद न करें।
पिछले बजट सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने लोकसभा में नहीं आए। तब मूर्खों के द्वारा यह तक कहा गया कि उनके सदन में आने पर खतरा हो सकता है तो फिर आप सुरक्षित कहां है। इस बार अमित शाह का मामला सामने आया। सवाल सीधा था २० जुलाई को छात्रों पर पेलेट गन क्यों चली? लोहे की कीलें, लाठियां, आंसू गैस और छात्राओं के साथ कथित दुर्व्यवहार का आदेश किसने दिया? नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जवाब मांग रहे थे। लेकिन जवाब आया नहीं। २१ जुलाई के बाद अमित शाह लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों से अनुपस्थित रहे। १३ अगस्त को सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ तो वे दिखाई दिए। बारह साल में पहली बार सत्ता के बनाए हुए उस मिथक की पोल खुलती दिखाई दी कि मोदी और शाह का सामना कोई नहीं कर सकता।
राहुल गांधी पहले कह चुके थे कि प्रधानमंत्री मोदी उनके सामने सदन में नहीं बोल सकते। बजट सत्र में वह बात सच होती दिखी। फिर उन्होंने अमित शाह के लिए भी यही चुनौती रखी और मानसून सत्र ने उसका दूसरा प्रमाण दे दिया। यह राहुल गांधी की व्यक्तिगत विजय से ज्यादा उस राजनीति की पराजय है जो सवाल से डरती है। गोदी में बैठे पालतू मीडिया और अंधभक्तों को आखिर तक उम्मीद थी कि अमित शाह आएंगे और विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब देंगे। मगर जवाब क्या होता? क्या यह कहते कि हां, मासूम छात्रों पर बल प्रयोग का आदेश मैंने दिया था? क्या कहते कि पेलेट गन, कीलें लगी लाठी, आंसू गैस और छात्राओं के साथ हुई बदसलूकी मेरे आदेश पर की गई थी, इसकी जिम्मेदारी मेरी है?
अमित शाह सदन में आए, मगर सवाल का जवाब दिए बिना। वंदे मातरम् हुआ और सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित। सत्ता के पास बहुमत है, संस्थाएं हैं, संसाधन हैं। फिर भी जवाब देने का साहस नहीं है तो समझना चाहिए कि मौसम बदल चुका है। नफरत की आंधियों में वो ताकत नही रही जिसके सहारे वह अपनी नफरती सियासत चलाते थे। नारंगी-संतरे के झूठ से बनाई गई सियासी इमारत को सबसे बड़ा खतरा नफरत करने वाले पंद्रह-बीस प्रतिशत से नहीं, उस अस्सी-पचासी प्रतिशत जनता से है जो अभी भी मोहब्बत, बराबरी और भाईचारे की राजनीति चाहती है। गांधी अकेला खड़ा होता है तो सत्ता की दीवारें अपने आप नहीं गिरतीं। मगर उनमें दरार जरूर पड़ जाती है। इसे ही गांधीवाद कहते हैं।
सत्यमेव जयते
