मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : अब ‘सेलिब्रिटी’ भी कानून की नजर में!

अंदर की बात : अब ‘सेलिब्रिटी’ भी कानून की नजर में!

राजन पारकर

महाराष्ट्र में प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नाम फिर से चर्चा में है, तुकाराम मुंढे! कहा जाता है कि सरकारी कुर्सी पर बैठा अधिकारी अगर फाइलों को सिर्फ आगे बढ़ाता रहे तो उसे ‘अच्छा अधिकारी’ कहा जाता है; लेकिन अगर फाइल के पीछे छिपे सवाल को पकड़ ले तो अचानक वही अधिकारी ‘सख्त’ हो जाता है! मुंढे के नेतृत्व में इDA की कार्रवाई और बॉलीवुड के बड़े नामों को कारण बताओ नोटिस दिए जाने की खबर ने इसी पुरानी बहस को फिर हवा दे दी है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ जैसे बड़े नामों का उल्लेख इस विवाद में हो रहा है। मामला कथित तौर पर ‘विमल इलायची’ के विज्ञापन से जुड़ा है और आरोप यह है कि इसके जरिए प्रतिबंधित पान मसाला उत्पाद का अप्रत्यक्ष प्रचार हो सकता है। अब सवाल यह नहीं कि अभिनेता कितना बड़ा है। सवाल यह है कि कानून बड़ा है या चेहरा?अगर राज्य में किसी उत्पाद पर प्रतिबंध है, तो उसका प्रचार किसी छोटे दुकानदार ने किया हो या करोड़ों रुपए कमाने वाले सुपरस्टार ने कानून की किताब में उसका वजन एक जैसा होना चाहिए। यहीं मुंढे की सख्ती का असली अर्थ निकलता है।
नोटिस से लेकर आवारा कुत्तों तक, ‘व्यवस्था’ की ऐसी-तैसी!
कहीं मुंढे की सख्ती से हवा टाइट, कहीं सांसद का ‘खाली कुर्सी अभियान’, तो कहीं मुंबई की सड़क पर इंसान ही असुरक्षित! महाराष्ट्र में इन दिनों तीन तस्वीरें बड़ी दिलचस्प हैं। एक तरफ प्रशासन में तुकाराम मुंढे की कथित सख्ती से बड़े-बड़े नामों को नोटिस की गर्मी महसूस हो रही है। दूसरी तरफ नेता को भाषण सुनने के लिए जनता चाहिए, लेकिन जनता न मिले तो कार्यकर्ताओं को कुर्सियों पर बैठाने का ‘लोकतांत्रिक आदेश’ भी जारी हो जाता है। और तीसरी तरफ मुंबई की सड़कों पर आम नागरिक को आवारा कुत्तों से अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ रही है। सवाल एक ही है, सरकार चल रही है या सिर्फ नोटिस, भाषण और वीडियो चल रहे हैं?
जनता नहीं तो कार्यकर्ता ही सही!
राजनीतिक सभा में खाली कुर्सियां नेता को उतनी ही डराती हैं जितना परीक्षा में खाली उत्तरपत्रिका छात्र को! नेता मंच पर पहुंचता है, सामने नजर दौड़ाता है और अगर पांच कुर्सियां खाली दिख जाएं तो भाषण का जोश भी कभी-कभी पांच डिग्री नीचे चला जाता है। ऐसी ही एक सभा में धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर का कथित अंदाज चर्चा में है। खाली कुर्सियां दिखाई दीं और नेता जी ने अपने ही कार्यकर्ताओं को फरमान सुना दिया‘अरे नीचे बैठो, तुम्हें क्या?’ बस फिर क्या था! सभा राजनीति से ज्यादा कॉमेडी का मंच बन गई।कार्यकर्ता शायद सोच रहे होंगे कि हम सभा सुनने आए हैं या कुर्सियों की जनगणना करने? लेकिन इस पूरे प्रसंग में महाराष्ट्र की राजनीति का एक बड़ा सच छिपा है। नेता को जनता चाहिए। जनता को नेता चाहिए।और दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है, कुर्सी! कुर्सी खाली हो तो नेता बेचैन और कुर्सी पर कोई बैठ जाए तो नेता प्रसन्न। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आज की राजनीति में भीड़ सिर्फ भीड़ नहीं रही। वह राजनीतिक ताकत का दृश्य प्रमाण बन गई है। मंच पर नेता चाहे जितना बड़ा भाषण दे, लेकिन सामने खाली कुर्सियां वैâमरे में आ जाएं तो सोशल मीडिया अगले पांच मिनट में पूरा हिसाब कर देता है। इसलिए कार्यकर्ताओं को नीचे बैठाने का आदेश सुनकर हंसी जरूर आती है, मगर उसके पीछे की राजनीतिक बेचैनी समझना भी जरूरी है।
‘साहब, पहले सड़क पर सुरक्षित चलने दीजिए!’
मुंबई की महानगरीय व्यवस्था में करोड़ों रुपए के बजट, हजारों कर्मचारी और अनेक विभाग हैं। फिर भी अगर एक वृद्ध महिला सड़क पर चलती हुई आवारा कुत्तों से बचने के लिए संघर्ष करती दिखाई दे, तो सवाल सिर्फ कुत्तों पर नहीं, व्यवस्था पर भी उठता है। और यही सबसे कड़वा सवाल है मुंबई में इंसान को बचाने के लिए सीसीटीवी चाहिए या जिम्मेदार प्रशासन?
खबरों का असली हिसाब
एक तरफ अधिकारी कानून के नाम पर बड़े चेहरों को नोटिस भेज रहा है। दूसरी तरफ नेता खाली कुर्सियों को भरने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को आदेश दे रहा है। और तीसरी तरफ आम आदमी सड़क पर सुरक्षित चलने के लिए प्रशासन की ओर देख रहा है।

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