-सुप्रीम कोर्ट में छात्र आंदोलन पर बड़ी सुनवाई; एफआईआर खत्म करने के लिए अनुच्छेद १४२ के इस्तेमाल पर विचार
-२५ जुलाई का वादा नहीं निभाया तो फिर आंदोलन, ‘इस बार युवाओं का गुस्सा संभालना मुश्किल होगा’
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
छात्र आंदोलन खत्म कराने के लिए सरकार ने वादे तो कर दिए, लेकिन अब उन्हीं वादों को जमीन पर उतारने में आखिर देर क्यों हो रही है? मंगलवार, १८ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर और देश के दूसरे हिस्सों में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के बाद यही सवाल फिर राजनीतिक रूप से विस्फोटक बन गया है। कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए बेहद तीखा सवाल किया है, ‘अगर राजनीतिक जोड़-तोड़ में सांसदों को ५०-५० करोड़ रुपए दिए जा सकते हैं, हजारों करोड़ रुपए के विमान और बड़ी परियोजनाओं पर खर्च हो सकता है तो उन छात्र परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा देने में सरकार की जेब क्यों खाली हो जाती है?’ पार्टी ने साफ चेतावनी दी है कि यदि केंद्र ने २५ जुलाई को किए गए वादों से पीछे हटने की कोशिश की, तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी फिर बैठक करेगी और देशव्यापी आंदोलन का रास्ता दोबारा खुल सकता है।
अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश बेहद महत्वपूर्ण था, छात्रों का पूरा जीवन और भविष्य उनके सामने पड़ा है और किसी आंदोलन में शामिल होने के कारण उनका भविष्य अनावश्यक रूप से बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने छात्रों के अनुच्छेद १९ के तहत विरोध प्रदर्शन के अधिकार का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट बोला, छात्रों का भविष्य दांव पर है
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने संकेत दिया कि सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामलों को समाप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद १४२ के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है। अनुच्छेद १४२ सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए व्यापक आदेश देने की शक्ति देता है। अदालत ने राज्यों से ऐसे एफआईआर की सूची देने की बात कही, जिनमें सामान्य छात्र प्रदर्शनकारी शामिल हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के मामले अलग रखे जा सकते हैं।
सरकार सूची दे तो एक झटके में रास्ता साफ?
कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। सीजेपी का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट खुद कह रहा है कि सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़ी एफआईआर की सूची सामने लाई जाए और आवश्यकता पड़ने पर अनुच्छेद १४२ का इस्तेमाल किया जा सकता है, तो राज्यों और केंद्र को उस प्रक्रिया में तेजी दिखानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़ी एफआईआर का विवरण उपलब्ध कराने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया कि संबंधित मामले सामने आने के बाद उन्हें समाप्त करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। सीजेपी के मुताबिक, उसके पक्ष की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने भी एफआईआर खत्म किए जाने के पक्ष में दलील रखी। आज की सुनवाई में ग्रोवर ने अदालत के सामने प्रस्तुतियां दी थीं।
२५ जुलाई को सरकार ने क्या कहा था?
यहीं सरकार के लिए राजनीतिक मुश्किल बढ़ती है। २५ जुलाई को केंद्र सरकार और सीजेपी नेतृत्व के बीच बातचीत के बाद जंतर-मंतर आंदोलन वापस लेने की घोषणा हुई थी। उस संयुक्त प्रेस कॉन्प्रâेंस में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जीतेंद्र सिंह भी मौजूद थे। उस समय नड्डा ने कहा था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि प्रभावित परिवारों को नियमों के भीतर ‘सम्मानजनक मुआवजा’ दिया जाएगा। पार्टी का सवाल है, जब २५ जुलाई को देश के सामने बात तय हो गई थी तो १८ अगस्त को भी एफआईआर और मुआवजे की प्रक्रिया अधूरी क्यों है?
मुआवजे पर सबसे तीखा हमला
सीजेपी ने मुआवजे में हो रही कथित देरी को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों मुद्दा बनाने के संकेत दिए हैं। पार्टी की दलील है कि सरकार हजारों करोड़ रुपए वाली परियोजनाओं के लिए पैसा निकाल सकती है, सरकारी विमान खरीद सकती है, बड़ी निर्माण योजनाओं पर भारी खर्च कर सकती है, लेकिन जिन परिवारों ने परीक्षा व्यवस्था और उसके बाद बने संकट में अपने बच्चों को खोया, उनके लिए घोषित मुआवजा देने में लंबी प्रक्रिया का हवाला दिया जा रहा है। सीजेपी ने इसी संदर्भ में बेहद तीखी भाषा में कहा ‘राजनीति में ५०-५० करोड़ में सांसद खरीदने के आरोप लगते हैं तो पैसा है, हजारों करोड़ के जहाज खरीदने के लिए पैसा है, सेंट्रल विस्टा जैसी परियोजनाओं के लिए पैसा है, लेकिन छात्रों के परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा देने के लिए पैसा नहीं है?’ २५ जुलाई की रिपोर्टिंग के मुताबिक, सीजेपी ने मृत छात्रों के परिवारों के लिए एक करोड़ रुपए मुआवजे की मांग रखी थी, जबकि सरकार ने नियमों के भीतर सम्मानजनक मुआवजा देने पर सहमति जताई थी।
पुलिस की कथित ज्यादती की भी होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई हिंसा, दोनों पहलुओं की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी बनाने का पैâसला किया है।
सीजेपी की चेतावनी, वादे से पलटे तो फिर सड़क पर
सुनवाई के बाद कॉकरोच जनता पार्टी का स्वर समझौते से ज्यादा चेतावनी वाला नजर आया। पार्टी का कहना है कि उसने सरकार के आश्वासन पर ‘गुड फेथ’ में अपना आंदोलन समाप्त किया था। वास्तव में २५ जुलाई को आंदोलन समाप्त करते समय सीजेपी ने सार्वजनिक रूप से कहा भी था कि वह सरकार द्वारा तय शर्तों के पालन की उम्मीद में आंदोलन वापस ले रही है।
अब पार्टी कह रही है कि यदि बैठकें नहीं हुर्इं, एफआईआर की सूची सुप्रीम कोर्ट को नहीं दी गई और मुआवजे पर ठोस कदम नहीं उठे तो सरकार यह न माने कि आंदोलन हमेशा के लिए समाप्त हो गया। सीजेपी ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ी तो उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आपात बैठक बुलाकर अगले आंदोलन पर निर्णय लिया जाएगा। साथ ही पार्टी अपने देशव्यापी ‘लिसनिंग टूर’ और ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के जरिए युवाओं और छात्रों के बीच जाने की तैयारी का दावा कर रही है।
अब सरकार के सामने दोहरी परीक्षा
इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के सामने अब दो मोर्चे हैं।
पहला कानूनी, सुप्रीम कोर्ट को छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़ी एफआईआर का साफ डेटा देना और यह तय करना कि किन मामलों को वापस लेना है।
दूसरा राजनीतिक और नैतिक, २५ जुलाई को जिस समझौते के आधार पर ३६ दिन पुराना बड़ा आंदोलन खत्म हुआ था, उसके वादों को समय पर लागू करना। २५ जुलाई को सरकार ने एफआईआर वापसी और सम्मानजनक मुआवजे की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार की थी। यही वजह है कि १८ अगस्त की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई केवल एक कानूनी कार्यवाही भर नहीं रह गई है।
यह अब सरकार के वादे की परीक्षा भी बन गई है।
कॉकरोच जनता पार्टी का संदेश सरकार को लगभग अल्टीमेटम की भाषा में है, ‘युवाओं से जो कहा था, उसे पूरा कीजिए। एफआईआर खत्म कराइए, पीड़ित परिवारों को मुआवजा दीजिए और सुप्रीम कोर्ट के सामने साफ रुख रखिए। अगर सरकार अपने वादे से पलटी, तो युवाओं को फिर सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।’ और यही वह चेतावनी है, जो आने वाले दिनों में छात्र आंदोलन की अगली राजनीतिक दिशा तय कर सकती है।
