-पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप ने उठाए सवाल, ‘जब छुपाने को कुछ नहीं है तो पारदर्शिता से डर क्यों?’
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
डिजिटल इंडिया को लेकर केंद्र सरकार लगातार देशभर में डिजिटाइजेशन, ई-गवर्नेंस और तकनीक आधारित पारदर्शिता की बात करती रही है। लेकिन पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप ने अब सवाल सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय पर खड़ा कर दिया है, जब मंत्रालय डिजिटल हो सकते हैं, तो पीएमओ की फाइलें पूरी तरह डिजिटल क्यों नहीं हो सकतीं?
स्वरूप का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अत्यंत संवेदनशील निजी मामलों को छोड़कर पीएमओ में आने वाली अधिकांश फाइलें डिजिटल प्रणाली से चलनी चाहिए। इससे यह साफ दिखाई देगा कि कौन-सी फाइल किस अधिकारी के पास कितने समय से लंबित है और निर्णय में देरी आखिर किस स्तर पर हो रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार पूरे देश को डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शिता की ओर ले जाना चाहती है, तो इसकी शुरुआत सबसे शक्तिशाली कार्यालय से क्यों नहीं होनी चाहिए? स्वरूप के मुताबिक तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यही है कि वह देरी, अक्षमता और फाइल रोककर बैठने की प्रवृत्ति को उजागर कर देती है।
डिजिटल सिस्टम में हर स्तर पर टाइमलाइन दर्ज रहती है और किसी अधिकारी के लिए यह छुपाना मुश्किल हो जाता है कि प्रस्ताव आखिर क्यों अटका हुआ है।
स्वरूप का सवाल बेहद सीधा है
पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप का यह भी कहना है कि यह केवल भ्रष्टाचार का सवाल नहीं है। डिजिटाइजेशन से अक्षमता और अनावश्यक देरी भी सामने आती है। कई बार सत्ता और नौकरशाही की ताकत इसी बात से बनती है कि आम व्यक्ति को पता ही नहीं होता कि उसकी फाइल कहां अटकी हुई है।
स्वरूप के शब्दों में, यदि नागरिक और शीर्ष नेतृत्व दोनों यह देख सकें कि फाइल किस टेबल पर कितने दिन से पड़ी है, तो निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और जवाबदेही भी तय होगी। उन्होंने कहा कि डिजिटल इंडिया का संदेश तभी पूरी तरह विश्वसनीय होगा जब ‘चैरिटी बिगिन्स एट होम’ के सिद्धांत पर पीएमओ स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।
यानी सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं है। सवाल यह है कि देश को पारदर्शिता का पाठ पढ़ाने वाली व्यवस्था अपने सबसे ताकतवर कार्यालय की फाइलों पर वही पारदर्शिता लागू करने को कितनी तैयार है?
