-राम मंदिर निर्माण से पहले रडार सर्वे में 16.5 फीट नीचे तक ली गईं तस्वीरें
-1528 ई. से पहले विवादित स्थल पर कोई मंदिर अथवा भवन मौजूद था या नहीं, यह जानना था : चंपत राय
मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ
राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय की ओर से लिखा गया 21 पेज का एक और पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस पत्र में चंपत राय ने मंदिर के अस्तित्व के सवाल पर रडार सर्वे और पुरातात्विक उत्खनन का विस्तृत उल्लेख किया है। उन्होंने ‘श्रीराम जन्मभूमि मंदिर इतिहास और संघर्ष’ शीर्षक से यह पत्र तैयार किया है।
पत्र के पृष्ठ संख्या 18 पर लिखे विवरण में उन्होंने बताया है कि विवादित स्थल के नीचे किसी पुराने भवन के अवशेष होने की जांच के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया गया था। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से उत्खनन कराया गया। पत्र में चंपत राय ने लिखा है कि विवाद का एक प्रमुख प्रश्न यह था कि 1528 ई. से पहले विवादित स्थल पर कोई मंदिर अथवा भवन मौजूद था या नहीं।
विशेषज्ञों के माध्यम से कराया गया रडार सर्वे
इस सवाल के जवाब में पत्र में कहा गया है कि जमीन के नीचे वैज्ञानिक जांच कराने का प्रयास किया गया। दिल्ली आईआईटी और रूड़की आईआईटी से संपर्क किया गया, लेकिन दोनों संस्थानों ने असमर्थता जताई। इसके बाद ‘तोजो विकास इंटरनेशनल’ नाम की संस्था के विशेषज्ञों के माध्यम से रडार सर्वे कराया गया।
पत्र के अनुसार, वर्ष 2003 में कनाडा के विशेषज्ञों ने रडार तरंगों के माध्यम से जमीन की सतह के नीचे करीब 16.5 फीट तक 50 से अधिक स्थानों की तस्वीरें लीं। इन तस्वीरों के आधार पर तैयार रिपोर्ट में जमीन के नीचे किसी भवन की मौजूदगी का उल्लेख किया गया था। इसके बाद रडार रिपोर्ट की सत्यता और उसमें सामने आए तथ्यों की जांच के लिए एएसआई को संबंधित स्थानों पर उत्खनन करने का आदेश दिए जाने का पत्र में उल्लेख है।
चंपत राय के लिखे पत्र के अनुसार, उत्खनन में लगे मजदूरों में 40 प्रतिशत मुस्लिम समाज से रखने, उत्खनन की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने तथा सभी पक्षकारों, उनके अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों को मौके पर मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी। यह उत्खनन करीब छह महीने चला।
एएसआई की रिपोर्ट दो हिस्सों में थी। एक हिस्से में तस्वीरें थीं, जबकि दूसरे में मानचित्र और लिखित विवरण शामिल था। रिपोर्ट के सारांश का हवाला देते हुए लिखा गया है कि यहां एक उत्तर भारतीय शैली का मंदिर था।
पत्र में बताया गया है कि प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास से संबंधित पुस्तकों, राजस्व अभिलेखों, रडार फोटोग्राफी रिपोर्ट, उत्खनन रिपोर्ट और गवाहों के बयानों को आधार बनाकर 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीनों न्यायाधीशों ने अलग-अलग निर्णय सुनाए।
