राजेश सरकार / प्रयागराज
संगम नगरी में सावन के चौथे सोमवार को पारंपरिक ‘गहरेबाजी’ का आयोजन हुआ। प्रयाग गहरेबाजी संघ के अध्यक्ष राजीव भारद्वाज ‘बब्बन भइया’ की अगुवाई में यह पारंपरिक उत्सव नए यमुना पुल के नीचे अरैल रोड पर आयोजित किया गया। रोमांचक आयोजन में दूर-दराज से आए करीब दो दर्जन नामी गहरेबाजों ने अपने सजे-धजे घोड़ों की अद्वितीय चाल, रफ्तार और कदमताल का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया।
800 मीटर के ट्रैक पर गूंजी टापें
अरैल रोड पर बने 800 मीटर लंबे ट्रैक पर शाम पांच से सात बजे तक घोड़ों की टापों की गूंज सुनाई देती रही। सधी हुई लगाम के साथ मैदान में उतरे एक-एक घोड़े ने दस-दस बार ट्रैक पर दौड़ लगाकर अपनी ताकत और प्रशिक्षण का लोहा मनवाया। प्रतियोगिता के दौरान कभी ‘बादामी’ हवा से बातें करते हुए सबसे आगे निकल जाता, तो उसे टक्कर देने के लिए ‘बुलेट’ और ‘उड़ान’ पीछे से तेजी से कदम बढ़ाते। इस रोमांचक नजारे ने वहां मौजूद हजारों दर्शकों की धड़कनें बढ़ा दीं।
भक्ति के साथ दिखा देशभक्ति का संगम
इस बार के आयोजन में स्वतंत्रता दिवस का भी अनूठा असर देखने को मिला। कई गहरेबाजों ने अपनी बग्गियों और घोड़ों की साज-सज्जा में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगाया था। तिरंगे की आन-बान-शान के साथ घोड़ों की दौड़ का यह नजारा शिवभक्ति और देशभक्ति का अद्भुत संगम बन गया, जिसने हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
जीत-हार नहीं, गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक
प्रयागराज की गहरेबाजी सिर्फ एक खेल या घुड़दौड़ नहीं है, बल्कि यह दशकों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर और गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा उदाहरण है। सावन के हर सोमवार को आयोजित होने वाले इस खेल की शुरुआत सदियों पहले यहां के तीर्थपुरोहितों के शौक से हुई थी। इस उत्सव की सबसे खास बात यह है कि इसमें जीत-हार या इनाम की कोई होड़ नहीं होती। इसमें केवल घोड़ों की चाल, लय, प्रशिक्षण और उनकी खूबसूरती देखने को मिलती है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इस पारंपरिक नजारे और महादेव की भक्ति के अद्भुत मेल को देखने के लिए नए यमुना पुल और अरैल रोड पर हजारों लोग परिवार सहित पहुंचे। दर्शकों की भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, ताकि यातायात और कानून-व्यवस्था सुचारू रूप से बनी रहे।
मैदान में उतरे संगम नगरी के ‘बाहुबली’ घोड़े
इस ऐतिहासिक आयोजन में अपनी रफ्तार का जादू बिखेरने वाले प्रमुख घोड़े और उनके संरक्षकों में छोटा भूकंप-लालजी यादव, राजा-जमुना महेवा, रॉकेट-गुड्डू महाराज (अरैल), तूफान-पुदुक महाराज, बजरंगी गुरु-कृपाशंकर त्रिपाठी (गंगागंज), बुलेट-रम्मन यादव (मीरपुर), विष्णु प्रसाद शर्मा, उड़ान-बनवारी लाल शर्मा, बादामी-असीम भारद्वाज, समन्द-मुरली दुबे और सुरंग-बदरे आलम शामिल रहे।
