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बिछुड़ों को अपनों से मिलाता है ग्रेस फाउंडेशन

 रवीन्द्र मिश्रा / मुंबई

बचपन में माताएं जब अपने बच्चों के गंदे कपड़े (डायपर) बदलती हैं तो उन्हें इस कार्य में जरा भी संकोच नहीं होता। लेकिन जब बूढ़े मां-बाप के डायपर बदलने का समय आता है तो वही औलादें नाक भौं सिकोड़ती हैं। अपने औलाद के तानों से अपमानित बूढ़े या तो घर छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं या फिर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। ऐसे ही घरों से अपमानित होकर निकले लोगों का सहारा मुंबई की सामाजिक संस्था ग्रेस फाउंडेशन बनता है, जो अपनों से बिछुड़ गये लोगों को फिर से उनके परिजनों से मिलाने का काम करता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तथा महाराष्ट्र से लेकर बंगाल अभी तक 900 से अधिक लोगों को उनके परिजनों से मिलाने वाले ग्रेस फाउंडेशन के अध्यक्ष शंकर अन्ना ने बताया कि उनके पास मुंबई सेंट्रल जीआरपी पुलिस से सूचना मिली कि एक 65 वर्षीय महिला अपना घर-बार भूल कर महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर भटक गई हैं। उसे आपके मदद की जरूरत है। पुलिस सूचना पर ग्रेस फाउंडेशन की टीम उसे अपने आश्रम में ले आई। मुंबई की बोली भाषा से अनजान तथा मानसिक रुप से कमजोर वह वृद्ध महिला बराबर जवाब नहीं दे पा रही थी। कुछ दिन के इलाज के बाद उसने अपना नाम सरस्वती प्रजापति बताया। उसने यह भी बताया कि वह बनारस के राम नगर की रहने वाली है और उसका बेटा रिक्शा चलाता है। पुलिस कंट्रोल रूम से पता चला कि एक बूढ़ी महिला के गायब होने की शिकायत नालासोपारा पुलिस को मिली है। छानबीन करने पर पता चला कि नालासोपारा पूर्व विलालपाड़ा खंडोबा मंदिर के पास रहने वाले विनोद प्रजापति ने अपनी मां के गुमशुदगी की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई है। अपने बेटे से नाराज़ मां बेटे के पास जाना नहीं चाहती थी। उसने जिद की उसे अपने गांव छोड़ दो। पूरी तरह स्वस्थ होने तथा डाक्टर की सलाह पर ग्रेस फाउंडेशन की टीम उसे लेकर कुर्ला टर्मिनस से बनारस के लिए रवाना हुई। वहां पहुंच कर रामनगर में रहने वाले बड़े बेटे अखिलेश प्रजापति के पास जाकर सरस्वती को सौंप दिया गया।इस कार्य के लिए प्रजापति परिवार तथा वहां के ग्रामीणों ने ग्रेस फाउंडेशन को धन्यवाद दिया। बिछुड़ों को उनके परिजनों से मिलाने वाली परेशानी को लेकर शंकर अन्ना कहते हैं सबसे बड़ी समस्या उनकी बोली भाषा की होती है। कभी-कभी वे रास्ते में इतने भावुक हो जाते हैं कि उन्हें संभालना मुश्किल होता है।

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