राजेश विक्रांत
उर्दू के सुपरिचित लेखक एवं साहित्यिक पत्रिका ‘इस्मत’ के संपादक अशअर नजमी का उपन्यास ‘कांग्रेस हाउस’ मुंबई के ग्रांट रोड इलाके में स्थित दो ऐतिहासिक स्थलों—कांग्रेस हाउस और उसकी पड़ोसन एनबी कंपाउंड यानी मुजरा घर—के इतिहास के बहाने समाज और मानवीय व्यवहार की गहन पड़ताल करता है। कांग्रेस हाउस का जन्म 26 मार्च 1925 को हुआ था। महात्मा गांधी ने इसकी परवरिश की और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह अंग्रेजों के विरुद्ध चट्टान बनकर खड़ा रहा।
‘कांग्रेस हाउस’ के अनुवादक रिजवानुद्दीन फारूकी ने लिखा है कि यह एक अलग किस्म का उपन्यास है। यह न तो किसी नायक की गाथा है और न ही कोई मुख्य पात्र अकेले अपने कंधों पर पूरी कहानी उठाए हुए है। इसमें एक कहानी के गर्भ से दूसरी कहानी का जन्म होता है, फिर दूसरी से तीसरी और चौथी कहानी सामने आती है। उपन्यास में आख्यान की कई परतें हैं और हर परत में एक कहानी छुपी है। इन छोटी-बड़ी कहानियों के अलावा एक अदृश्य कहानी भी पंक्तियों के बीच तैरती रहती है। लेखक ने इसमें उत्तर-आधुनिक तकनीक ‘नेस्टेड नैरेटिव’ का इस्तेमाल किया है।
यह कोई राजनीतिक उपन्यास नहीं है। उपन्यास के सभी पात्र, मुंबई की गलियां, अदालत, सांप्रदायिक दंगे, वेश्या, कॉल गर्ल, ऐतिहासिक घटनाएं, कांग्रेस हाउस और एनबी कंपाउंड—ये सब प्रतीकों की एक श्रृंखला हैं, जो अस्तित्वगत और सामूहिक स्तर पर राजनीति और धर्म के पीछे छिपे क्रूर तंत्र की गवाही देते हैं। यह उपन्यास एक शहर, बल्कि पूरे देश और यहां तक कि पूरी दुनिया के जंगल बनने की प्रक्रिया को बड़ी निर्दयता से प्रदर्शित करता है।
‘जंगल की सैर’, ‘शिकारियों से भरा ग्रह’, ‘मचान और बायस्कोप’, ‘शिकार शुरू होता है’, ‘खतरा करीब आ रहा है’, ‘गिद्ध और मुफ्त की दावत’, ‘नए शिकारी पुराने शिकार’, ‘घुसपैठिए अंदर आए तो मारे जाएंगे’, ‘मुसीबत सिर्फ मगरमच्छ नहीं है’, ‘गोश्त का बंटवारा खतरे से खाली नहीं है’, ‘मेरा नाम कांग्रेस हाउस है’, ‘मैं कांग्रेस हाउस की पड़ोसन हूं’, ‘बाजी पलट भी सकती है’, ‘जंगल का राजा शेर नहीं, खुद जंगल’ और ‘एक खबर’—इन अध्यायों में बंटे ‘कांग्रेस हाउस’ के हर अध्याय की शुरुआत एक उचित कथन से होती है। मसलन, पहले अध्याय ‘जंगल की सैर’ में डेसमंड मॉरिस का कथन है—‘जाहिर है शहर कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि यह एक इंसानी चिड़ियाघर है।’ वहीं आखिरी अध्याय ‘जंगल का राजा शेर नहीं, खुद जंगल’ में रोना बैरेट का कथन है—‘यह विडंबना है, लेकिन जब तक आप अपने अंदर के जंगल में मौजूद उन आखिरी राक्षसों को मुक्त नहीं कर लेते, आपकी जिंदगी, आपकी आत्मा खतरे में है।’
‘कांग्रेस हाउस’ की शुरुआत में लेखक को उसके एक मित्र और फिल्म प्रचारक रियाज बलोच का फोन आता है। रियाज के दो दोस्त कांदा किंग इंद्र और वकील चेतन गुजरात से मुंबई मौज-मस्ती करने आने वाले हैं। चारों लोग अंधेरी के क्रिस्टल प्लाजा में एक मशहूर डिस्को पब में शराबनोशी करते हैं। इसके बाद रियाज उन्हें रेड लाइट इलाके की सैर कराने ले जाता है। टैक्सी पहले फॉकलैंड रोड, फिर फारस रोड और तत्पश्चात कांग्रेस हाउस पहुंचती है।
“‘कांग्रेस हाउस’ ग्रांट रोड पुलिस स्टेशन के पास लैमिंगटन रोड के एक चौराहे पर स्थित था। एक जमाने में यह स्वतंत्रता सेनानियों का मुख्यालय हुआ करता था। ‘कांग्रेस रेस्तरां’ और ‘कांग्रेस बार’ उसी परिसर के व्यावसायिक हिस्से थे।”
टैक्सी कांग्रेस हाउस परिसर से सटी इमारत एनबी कंपाउंड पहुंचती है। एनबी कंपाउंड यानी मुजरा घर, जहां देह व्यापार नहीं होता, बल्कि सिर्फ मुजरे का आयोजन होता है। इसके बाद के अध्याय ‘शिकारियों से भरा ग्रह’ से मूल कथा की शुरुआत एक अदालत के दृश्य से होती है, जिसमें लेखक मौजूद रहता है। सुहानी म्हात्रे नामक लड़की से कांग्रेस हाउस के परिसर में स्थित जिन्ना पीपल्स मेमोरियल हॉल में फरीद शेख नामक व्यक्ति ने बलात्कार किया था। इसी मामले का मुकदमा चल रहा है।
सुहानी ने सरकारी वकील की ओर सीधे देखते हुए जवाब दिया—“मैं 1992-93 के मुंबई दंगों का उपहार हूं। मैं मुसलमानों से लिया गया बदला हूं।”
आरोपी इसे बलात्कार नहीं मानता, क्योंकि उसका कहना है कि सुहानी सेक्स वर्कर थी, इसलिए उसने उसके साथ सेक्स किया, लेकिन बलात्कार बिल्कुल नहीं।
इस प्रसंग से लेखक की दिलचस्पी बलात्कार के घटनास्थल कांग्रेस हाउस और इसके ठीक बगल में स्थित एनबी कंपाउंड में बढ़ जाती है। लेखक बलात्कार के बहाने इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों के बीच मौजूद रिश्तों की उलझी डोर को समझना चाहता है। लिहाजा, लेखक कांग्रेस हाउस के ठीक सामने स्थित एक इमारत में एक अपार्टमेंट किराए पर ले लेता है। उसके अपार्टमेंट से दोनों इमारतें साफ-साफ दिखाई देती हैं।
“मैंने पहली खिड़की खोली। सामने कांग्रेस हाउस की विशाल इमारत खड़ी थी। चौड़ी सड़कों पर अच्छी-खासी रौनक थी, पर यहां ट्रैफिक का वह हंगामा नजर नहीं आया, जो आमतौर पर शहर के दूसरे हिस्सों में दिखता था। कांग्रेस हाउस में कुछ दुकानें खुली थीं। कांग्रेस रेस्तरां और कांग्रेस मेडिकल स्टोर में थोड़ी चहल-पहल नजर आई, पर अधिकतर दुकानों और कार्यालयों के जंग खाए शटर नीचे गिरे हुए थे। इतनी शानदार और ऐतिहासिक इमारत की यह उदासी जाने क्यों मुझे ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी’ की श्रीहीनता से मिलती-जुलती लगी। मुमकिन है, इसकी एक वजह यह हो कि आत्मा में समाया खालीपन धीरे-धीरे शरीर को भी खोखला कर देता है।”
वहां रहते हुए लेखक की कल्पना में महात्मा गांधी का भाषण उभरता है, जिन्ना के सम्मान में सरोजिनी नायडू का वक्तव्य याद आता है और ‘वंदे मातरम’ का स्मरण होता है। लेखक सुहानी से उसकी कहानी तफसील से जानता है।
कहानी में अगला पात्र राजेश म्हात्रे है, जिसके परिवार का एक बाकड़ा यानी फूड स्टॉल तिलक नगर के नाके पर होता है। राजेश की बड़ी बहन सीमा परिवार का हाथ बंटाती है। राजेश स्थानीय शाखा प्रमुख सुनील मोरे से प्रभावित होकर उसका कार्यकर्ता बन जाता है। इस बाकड़े पर वाहिद आता रहता है। वहीं उसकी और सीमा की आंखें लड़ती हैं। जब राजेश को इसका पता चलता है तो वह वाहिद की पिटाई करता है और सीमा को धमकाता है। लेकिन एक दिन सीमा वाहिद के साथ भाग जाती है।
इस खबर से राजेश का पारा चढ़ जाता है। वह इस प्रेम प्रसंग को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखते हुए नासिर लकड़ावाला की लकड़ी की टाल में आग लगा देता है। यह अपराध बड़ा है, लेकिन सुनील मोरे की मध्यस्थता से राजेश की गिरफ्तारी नहीं होती।
एक दिन राजेश को पता चलता है कि उसकी बहन को वाहिद ने मुंब्रा में रखा है। राजेश मुंब्रा जाता है, लेकिन उसका दांव उल्टा पड़ जाता है और मुंब्रा में उसकी काफी बेइज्जती होती है।
उपन्यास के कथानक में बाबरी मस्जिद के साथ कन्याकुमारी का श्री राम तारा मंदिर भी आता है। राजेश को उस समय दिली तसल्ली मिलती है, जब वह टीवी पर बाबरी मस्जिद का गुंबद ध्वस्त होते देखता है। उधर सुनील मोरे अयोध्या में कारसेवा करके मुंबई वापस आता है। वह अपने साथ गुलामी की आखिरी निशानी बाबरी मस्जिद के कुछ पत्थर भी लाया था। तिलक नगर में सुनील मोरे का भव्य स्वागत होता है। इसी समय मुंबई में सांप्रदायिक दंगे भड़क जाते हैं।
सीमा और वाहिद के रिश्ते से खफा राजेश एक मुस्लिम बच्ची नसरीन पर काफी जुल्म ढाता है। जब उसकी मां इस अत्याचार का विरोध करती है और उसे समझाती है तो राजेश नसरीन से शादी कर लेता है। सुनील मोरे राजेश की बढ़ती लोकप्रियता से डरकर उसे गिरफ्तार करवा देता है और खुद एक पक्का कांग्रेसी बन जाता है।
कुछ समय बाद नसरीन एक बच्ची को जन्म देती है, जिसका नाम सुहानी रखा जाता है। राजेश पैरोल पर बाहर आकर सुनील मोरे की हत्या कर देता है और फिर जेल पहुंच जाता है। अब नसरीन बाकड़े का काम संभाल लेती है और बाकड़े की रौनक वापस आती है। लेकिन जेल में बंद राजेश का गुस्सा भी बढ़ता जाता है। वह फिर पैरोल पर आकर नसरीन के साथ मारपीट करता है। सुहानी की शिकायत पर अदालत राजेश का पैरोल हमेशा के लिए रद्द कर देती है।
कुछ समय बाद नसरीन को कैंसर हो जाता है। सुहानी बाकड़े को संभाल लेती है। नसरीन की मृत्यु के बाद सुहानी बाकड़ा बंद कर देती है। उसे नृत्य पसंद था, इसलिए वह बार डांसर बन जाती है। डांस बार में सुहानी की मुलाकात विनोद से होती है। इसके बाद उसकी दोस्ती राजन से होती है।
जब महाराष्ट्र सरकार डांस बारों पर प्रतिबंध लगाती है तो राजन की सलाह पर सुहानी एनबी कंपाउंड में मुजरा करने आ जाती है और राजन वहां कांग्रेस बीयर बार में काम करने लगता है। राजन और सुहानी की दोस्ती चलती रहती है। राजन का एक और दोस्त है फरीद शेख।
“फारस रोड के जोहड़ में डुबकियां लगाते राजन की मुलाकात फरीद शेख से वहीं हुई थी। राजन वहां तवायफों की एक चाल का दलाल था… हालांकि वह खुद को ‘मैनेजर’ कहा करता था, जो उन तवायफों के पास आने वाले ग्राहकों से चुंगी वसूलता था।”
फरीद मुसीबत में राजन की मदद करता है, लेकिन सुहानी पर उसका दिल आ जाता है। सुहानी एक दिन फरीद को थप्पड़ मार देती है और फरीद सुहानी से बलात्कार करता है।
उपन्यास के आखिर के अध्याय ‘एक खबर’ में लिखा है—“मुंबई में ग्रांट रोड के पास स्थित कांग्रेस हाउस के सामने वाली इमारत के एक कमरे में एक व्यक्ति का क्षत-विक्षत शव मिला है। शव की पहचान हो गई है। बताया जा रहा है कि यह वही वकील था जिसके अदालत में दिए गए विवादास्पद बयानों से पिछले दिनों कई धार्मिक और राजनीतिक दलों में तीखी नाराजगी देखने को मिली थी। पुलिस जांच कर रही है, पर वह भी समझ नहीं पा रही है कि हत्या चाकू या पिस्तौल से नहीं की गई है, बल्कि लाश के पूरे शरीर पर जंगली जानवरों के नाखूनों और दांतों के निशान हैं, यहां तक कि शरीर के कई अंगों को जैसे जानवरों ने अपने दांतों से भंभोड़ डाला हो…”
इसी बिंदु पर उपन्यास खत्म हो जाता है, लेकिन साथ ही भारतीय समाज-व्यवस्था पर कई तीखे सवाल भी उठाता है। ‘कांग्रेस हाउस’ हमें इस बात के लिए चेताता है कि सच्चाई का कोई एक चेहरा नहीं होता। इसके हर चेहरे के पीछे एक और चेहरा है, हर बयान के पीछे एक और खामोशी है और हर पात्र के पीछे एक प्रतीक छिपा हुआ है।
राजपाल एंड संस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘कांग्रेस हाउस’ के पेपरबैक संस्करण का मूल्य 275 रुपये है। पुस्तक में 142 पृष्ठ हैं।
