अनिल तिवारी
मुंबई
अयोध्या के राम मंदिर की व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में तीन नए ट्रस्टी शामिल किए गए हैं, पहली बार महिला प्रतिनिधित्व आया है और पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का पहला मुख्य कार्यपालक अधिकारी बनाया गया है। पहली नजर में यह बदलाव समावेशी और पेशेवर प्रशासन की दिशा में उठाया गया कदम दिखाई देता है, लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है, क्या दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल राम मंदिर का संचालन सामाजिक और जातीय प्रतिनिधित्व के गणित से होना चाहिए या प्रबंधन क्षमता और विशेषज्ञता को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
राम मंदिर कोई सामान्य संस्था नहीं है। यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं, करोड़ों रुपये का चढ़ावा और दान आता है। सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, लेखा-परीक्षण, निर्माण, संपत्ति, श्रद्धालुओं की सुविधाएं और विशाल प्रशासनिक तंत्र संभालना पड़ता है। ऐसे संस्थान में किसी व्यक्ति की जाति, क्षेत्र या सामाजिक पहचान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह होना चाहिए कि उसे इतने बड़े धार्मिक और आर्थिक संस्थान के संचालन का कितना अनुभव है।
नई टीम में निर्मला यादव पहली महिला ट्रस्टी बनी हैं। महेश भागचंदका और मदन मोहन पांडे को भी स्थान मिला है। सामाजिक प्रतिनिधित्व का अपना महत्व है, लेकिन प्रतिनिधित्व कभी भी प्रशासनिक दक्षता का विकल्प नहीं हो सकता। मंदिर प्रबंधन में यदि नियुक्तियों का आधार यह संदेश देने लगे कि अमुक वर्ग को साधना है, अमुक सामाजिक समूह को प्रतिनिधित्व देना है या कोई राजनीतिक संतुलन बनाना है, तो यह राम मंदिर जैसी संस्था को अनावश्यक विवादों में खींच सकता है।
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का गंभीर मामला सामने आया। जांच के बाद कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और सुरक्षा तथा चढ़ावा प्रबंधन की कमजोरियां भी उजागर हुईं। अब ट्रस्ट नकदी की गिनती में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने और मानवीय हस्तक्षेप कम करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है। यानी समस्या पहले से ही प्रशासन, निगरानी और जवाबदेही की रही है। ऐसे समय में जरूरत थी कि पूरे ढांचे को किसी आधुनिक कॉरपोरेट संस्था अथवा विश्वस्तरीय धार्मिक संस्थान की तरह पेशेवर बनाया जाए। जिम्मेदारियां स्पष्ट हों, स्वतंत्र ऑडिट हो, पारदर्शी दान प्रणाली बने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो, खरीद और ठेकों की निगरानी सुनिश्चित हो और हर अधिकारी की जवाबदेही तय हो।
पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की सीईओ के रूप में नियुक्ति इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है। उनके पास भारतीय वायुसेना में लंबे प्रशासनिक और नेतृत्व का अनुभव है। लेकिन यहां भी नई चुनौती सामने है। ट्रस्ट अभी महामंत्री और सीईओ के अधिकारों का विभाजन स्पष्ट करने की प्रक्रिया में है, ताकि भविष्य में अधिकारों का टकराव न हो। यही तथ्य बताता है कि नई व्यवस्था अभी पूरी तरह परिभाषित नहीं हुई है।
असली सवाल भाजपा
या संघ से भी बड़ा है
इस पुनर्गठन के पीछे भाजपा या संघ परिवार द्वारा सामाजिक अथवा राजनीतिक समीकरण साधने के प्रयास को लेकर जनता का सवाल पूछना पूरी तरह जायज है। आखिर ट्रस्टी चुनने का मापदंड क्या था? उनकी धार्मिक स्थल प्रबंधन की प्रशासनिक योग्यता क्या है? किस सदस्य को कौन-सी जिम्मेदारी दी जाएगी? क्या इतने बड़े संस्थान के संचालन के लिए अनुभव आवश्यक नहीं होना चाहिए? अनुभवहीनता के कारण फिर कोई बड़ी चूक हुई तो जिम्मेदार कौन होगा? उनके काम का मूल्यांकन कैसे होगा? क्या ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आएगी?
इन सवालों का जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से बना है। उसका प्रशासन किसी राजनीतिक दल, संगठन, जाति या वर्ग के समीकरण से ऊपर होना चाहिए और यह केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
राम मंदिर में भगवान की प्रतिष्ठा हो चुकी है। उसे नई जिम्मेदार व्यवस्था भी मिल चुकी है। और अतीत के कड़वे अनुभव भी। उसके सामने पुराने अनुभवों से सीखने का अवसर है। प्रबंधन को पारदर्शी बनाने की जिम्मेदारी है। उस पर सबसे बड़ी परीक्षा व्यवस्था की प्रतिष्ठा बचाने की है। उम्मीद है यह व्यवस्था उसमें ईश्वर के आर्शीवाद से सफल होगी। पर तब भी यह सवाल तो कायम रहेगा ही कि यदि सामाजिक संतुलन साधने के प्रयास में प्रबंधन कमजोर हुआ, जिम्मेदारियां अस्पष्ट रहीं और नियुक्तियों में योग्यता दूसरे स्थान पर चली गई, तो चढ़ावा चोरी के बाद शुरू किया गया यह सुधार कहीं राम मंदिर को एक नए प्रशासनिक पचड़े में न डाल दे।
