इस्लाम की बात : सैयद सलमान मुंबई
लोकतंत्र का सबसे बुनियादी उसूल यह है कि शासन और संविधान की निगाह में कोई भी नागरिक अपने पंथ या नाम के आधार पर दोयम दर्जे का नहीं हो सकता। यह उसूल जब तक भाषणों तक सीमित रहे, तब तक सब ठीक लगता है। मगर जैसे ही यही उसूल प्रशासन और जमीनी हकीकत की कसौटी पर परखा जाता है, अंतर्विरोध खुद-ब-खुद उघड़ आते हैं। पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएं लगभग साथ-साथ सामने आर्इं, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय को लेकर सियासत की कथनी और करनी के बीच का फासला एक बार फिर बेपर्दा कर दिया।
ये वैâसी उदारता?
एक ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के एक वैश्विक मंच पर भारतीय दर्शन की व्याख्या करते हुए यह रेखांकित किया कि मानवता की एकता और सर्वसमावेशी दृष्टि ही वास्तविक पहचान है। उनका यह कथन कि जो व्यक्ति यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल देना चाहिए, वह वास्तव में उस समावेशी विचार का हिस्सा नहीं हो सकता, वह हिंदू नहीं हो सकता। उनका बयान सैद्धांतिक स्तर पर एक सकारात्मक और सुधारात्मक संदेश प्रतीत होता है। लेकिन इसी विचार के समानांतर जब देश के भीतर घट रही राजनीतिक और प्रशासनिक घटनाओं पर नजर डाली जाए, तो विरोधाभास साफ नजर आता है। सवाल यह है कि यह उदारता सरहद पार जाकर ही क्यों जागती है?
देश के भीतर वही आवाज
क्यों सुनाई नहीं देती है?
जवाब बंगाल की धरती पर उसी हफ्ते मिल गया। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरे के दौरान मुस्लिम अफसरों को जानबूझकर दूर रखा गया। सिलीगुड़ी के पुलिस आयुक्त वकार रजा को स्वागत की पंक्ति से हटा दिया गया, एसटीएफ के डीजी जावेद शमीम को कार्यक्रम में बुलाया ही नहीं गया और आईएएस अधिकारी खलील अहमद को बैठक से बाहर जाने को कह दिया गया। वरिष्ठ मुस्लिम प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को कथित तौर पर प्रोटोकॉल से दूर रखने पर सवाल पूछना वाजिब है कि क्या नौकरशाही जैसे निष्पक्ष और संवैधानिक तंत्र में भी व्यक्तिगत पहचान और धार्मिक पृष्ठभूमि को अविश्वास की कसौटी पर परखा जाने लगा है? सिविल सेवा के अधिकारी किसी दल या संप्रदाय के प्रतिनिधि न होकर, भारतीय संविधान की सेवा के प्रतीक होते हैं। यदि योग्यता और पद की गरिमा पर धार्मिक पहचान हावी होने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक संस्था के मनोबल को चोट पहुंचाने जैसा है। यह आरोप है, प्रमाण नहीं, मगर इस तरह के आरोप बार-बार, अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग मौकों पर उठते रहे हैं। घरेलू राजनीति की चुनावी जमीन पर ध्रुवीकरण को सबसे सुलभ राजनीतिक हथियार बना लिया गया है। ऐसे में समावेशिता के तमाम सिद्धांत नेपथ्य में चले जाते हैं।
विरोधाभास
देश के राजनीतिक परिदृश्य में यह विरोधाभास लगातार देखा जा रहा है। एक तरफ वैश्विक मंचों पर ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का उद्घोष होता है, तो दूसरी तरफ घरेलू चुनावी मंचों पर सत्ता पक्ष के कई प्रमुख नेताओं के बयानों में एक खास समुदाय को निशाना बनाती कठोर और आक्रामक भाषा आम हो चुकी है। योगी आदित्यनाथ का वह बयान भुलाया नहीं जा सकता, जिसमें सड़क पर नमाज को लेकर धमकी भरे लहजे में कहा गया कि प्यार से नहीं मानेंगे तो दूसरा तरीका अपनाया जाएगा। इसी क्रम में मुस्लिम आबादी को लेकर दी गई नसीहत भी बेहद अप्रिय अंदाज में बोली गई। सांसद निशिकांत दुबे अक्सर मुस्लिम प्रतिनिधियों और आलोचकों को धर्म के चश्मे से नाप कर उन्हें कटघरे में खड़ा करते नजर आते हैं। महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे का वह एलान भी कम चर्चित नहीं रहा, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर कहा कि उन्हें एक खास रंग के मतदाताओं से कोई सरोकार नहीं, वे सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करेंगे। यह वही नितेश राणे हैं, जिनकी मस्जिदों को लेकर दी गई धमकी भरी टिप्पणी पर खुद उनके पिता को सार्वजनिक रूप से नसीहत देनी पड़ी थी कि पूरा समाज एक जैसा नहीं होता।
‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नैरेटिव और अन्य धमकी भरे बयानों ने न केवल सामाजिक माहौल को विषाक्त किया है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय को अपने ही लोकतांत्रिक ढांचे में असुरक्षित और आशंकित महसूस करने पर मजबूर किया है। जब नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति से आने वाली भाषा में संकीर्णता और विभाजनकारी सुर मुखर हों, तो शीर्ष वैचारिक संगठनों द्वारा दिए जाने वाले सौहार्द के संदेश जमीन पर निष्प्रभावी साबित होने लगते हैं। राजनीति में भाषा और आचरण का यह दोहरापन बहुलतावादी समाज के ताने-बाने को कमजोर करता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के
हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
