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जीडीपी की रफ्तार पर रघुराम राजन का बड़ा सवाल …अगर ग्रोथ इतनी तेज है तो नौकरियां कहां हैं?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सरकार देश की तेज आर्थिक वृद्धि को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनाती रही है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इसी विकास कहानी के सबसे कमजोर पहलू पर उंगली रख दी है। उनका सीधा सवाल है, अगर भारतीय अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रही है, तो देश के युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां आखिर पैदा क्यों नहीं हो रही हैं?
जीडीपी के ‘ग्रोथ मॉडल’ पर
पूर्व आरबीआई गवर्नर को शक

मोदी सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर ७.८ प्रतिशत रही है। यह आंकड़ा कई अनुमानों से बेहतर है और सरकार इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती के प्रमाण के रूप में पेश कर रही है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन इस तस्वीर को केवल हेडलाइन ग्रोथ के सहारे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए साक्षात्कार में उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो रोजगार ज्यादा क्यों नहीं बढ़ रहा? निजी निवेश उस अनुपात में क्यों नहीं आ रहा? उन्होंने विकास के आधिकारिक आंकड़ों और जमीन पर दिख रही आर्थिक गतिविधियों के बीच अंतर की ओर ध्यान खींचा है। यानी सवाल केवल इतना नहीं है कि जीडीपी ७ प्रतिशत बढ़ी या ८ प्रतिशत।
असली प्रश्न यह है कि यह वृद्धि पहुंच कहां रही है? यदि उत्पादन बढ़ रहा है, कंपनियों का कारोबार बढ़ रहा है और अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, तो उसका स्वाभाविक परिणाम रोजगार, वेतन, निजी निवेश और घरेलू मांग में भी दिखाई देना चाहिए। लेकिन राजन का सवाल इसी कड़ी पर है। नौकरी की तलाश कर रहे करोड़ों युवाओं के लिए जीडीपी का आंकड़ा तभी मायने रखता है, जब उससे रोजगार पैदा हो। केवल अर्थव्यवस्था के आकार का बढ़ना उस युवा की समस्या हल नहीं करता जो डिग्री लेकर वर्षों तक नौकरी की परीक्षा देता रहे या कम वेतन वाले अस्थायी रोजगार में फंसा रहे। राजन ने इससे पहले भी निजी कॉरेपोरेट निवेश और विदेशी निवेश की कमजोरी का मुद्दा उठाया था। उनका तर्क रहा है कि सात प्रतिशत से अधिक की तेज वृद्धि और कमजोर निवेश गतिविधि का एक साथ बने रहना सहज आर्थिक तस्वीर नहीं बनाता। अब ताजा जीडीपी आंकड़ों के बाद वही सवाल और तेज हो गया है।
रोजगार और उत्पादकता के बीच बड़ा अंतर
दरअसल, भारत के आर्थिक विकास की सबसे बड़ी चुनौती अब ‘जॉबलेस ग्रोथ’ यानी रोजगारविहीन वृद्धि की आशंका है। अर्थव्यवस्था बढ़ सकती है, लेकिन यदि वृद्धि का बड़ा हिस्सा पूंजी-प्रधान क्षेत्रों से आता है और बड़ी संख्या में कामगारों को रोजगार नहीं मिलता, तो जीडीपी के आंकड़े और आम आदमी की आर्थिक स्थिति दो अलग-अलग कहानियां कहने लगते हैं। पूर्व आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव ने भी हाल में भारत की अर्थव्यवस्था के सामने रोजगार और उत्पादकता के बीच बढ़ते अंतर को बड़ी संरचनात्मक चुनौती बताया है। उनके अनुसार उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन औपचारिक और गुणवत्तापूर्ण नौकरियां उसी अनुपात में नहीं बन रही हैं। यही कारण है कि रघुराम राजन का सवाल राजनीतिक आरोप से ज्यादा एक बुनियादी आर्थिक प्रश्न बन जाता है।

 

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