न्यायालय के आदेश की अवहेलना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,
अगली सुनवाई १८ सितंबर को
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किए जाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। दिनेश गजानन भिसे बनाम लक्ष्मण उर्फ मोरेश्वर मारुति शिंदे मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादी को संबंधित संपत्ति १५ दिनों के भीतर खाली कर उसका कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपने का समय दिया है।
यह मामला कंटेम्प्ट पिटीशन (सिविल), डायरी नंबर २३६२१/२०२६ से जुड़ा है, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ११ नवंबर २०२४ को एसएलपी (सिविल) नंबर २६४६२/२०२४ में पारित अंतिम निर्णय एवं आदेश से उत्पन्न हुआ है। मामले की सुनवाई २ सितंबर २०२६ को न्यायमूर्ति एस. वी. एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ के समक्ष हुई।
प्रतिवादी के पास बचाव बेहद कमजोर
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित रावल ने अदालत के समक्ष कहा कि जिस अवज्ञा की शिकायत की गई है, उसके संबंध में प्रतिवादी के पास बहुत कम या लगभग कोई बचाव नहीं है। उन्होंने अदालत के अधिकारी के रूप में स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए प्रतिवादी को संपत्ति खाली करने और उसका खाली कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपने के लिए १५ दिनों का समय देने का अनुरोध किया। पीठ ने प्रतिवादी की उम्र और वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा गंभीरता के साथ दिए गए बयान को ध्यान में रखते हुए १५ दिनों की अवधि मंजूर कर दी।
‘न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान’
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय को दिए जाने वाले आश्वासनों और अंडरटेकिंग के उल्लंघन को लेकर भी गंभीर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि यदि अदालतों को दिए गए आश्वासनों के उल्लंघन को नियमित रूप से होने दिया जाए तो यह न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान होगा। यह टिप्पणी इस मामले को केवल संपत्ति के कब्जे के विवाद तक सीमित नहीं रखती, बल्कि न्यायालय के समक्ष दिए गए वचन और न्यायिक आदेशों की गरिमा से भी जोड़ती है।
१८ सितंबर को अगली सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई १८ सितंबर २०२६ को निर्धारित की है। ऐसे में अगली तारीख से पहले यह देखा जाएगा कि प्रतिवादी ने अदालत के समक्ष दिए गए बयान के मुताबिक संपत्ति खाली कर उसका कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपा है या नहीं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंजनी कुमार सिंह, आशा गोपालन नायर और निवेदिता नायर उपस्थित थे। प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमित रावल सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।
आदेश नहीं माना तो पुलिस अधीक्षक को मिल सकता है निर्देश
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कर दिया कि यदि अदालत के समक्ष दिया गया यह आश्वासन पूरा नहीं किया जाता है तो अदालत प्रतिवादी के खिलाफ कथित अवज्ञा के मामले की जांच जारी रखेगी। इतना ही नहीं, अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसी स्थिति में पुलिस अधीक्षक को प्रतिवादी से संबंधित संपत्ति का कब्जा लेने और उसे याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह चेतावनी मामले को बेहद गंभीर बना देती है, क्योंकि अब प्रतिवादी के सामने अदालत में दिए गए आश्वासन के अनुरूप निर्धारित अवधि में संपत्ति खाली करना जरूरी हो गया है।
