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सरकार बोली अर्थव्यवस्था दौड़ी, अर्थशास्त्रियों ने खोली परतें … ७.८ प्रतिशत की चमक के पीछे कितना अंधेरा?

सरकार के दावे पर पूर्व वित्त सचिव से पूर्व आरबीआई गवर्नर तक ने उठाए सवाल

सरकार अप्रैल-जून २०२६ तिमाही में ७.८ प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि को अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रमाण बता रही है, लेकिन आंकड़ों की चमक के पीछे कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सबसे तीखा सवाल पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने उठाया है। गर्ग का तर्क है कि यदि पिछले वर्ष के आधार आंकड़ों में भारी संशोधन किया गया है, तो ७.८ प्रतिशत की वृद्धि दर को बिना उस बदलाव का पूरा हिसाब दिए उपलब्धि के रूप में पेश करना भ्रामक हो सकता है।
गर्ग ने खास तौर पर अप्रैल-जून २०२५ के चालू कीमतों वाले जीडीपी अनुमान में बड़े संशोधन की ओर ध्यान दिलाया। उनका सवाल है कि यदि पिछले साल का आधार छोटा कर दिया जाए, तो अगली तिमाही की वृद्धि स्वाभाविक रूप से ज्यादा दिखाई दे सकती है। उन्होंने तो यहां तक कहा कि पुराने आंकड़े को आधार बनाया जाए तो वृद्धि कहीं ज्यादा कमजोर नजर आती है। हालांकि, सांख्यिकी मंत्रालय ने गर्ग की गणना को खारिज करते हुए कहा है कि वे पुरानी और नई जीडीपी शृंखला को मिला रहे हैं, जबकि नई शृंखला में आधार वर्ष, मूल्य सूचकांक और डेटा स्रोत बदल चुके हैं। तकनीकी रूप से सरकार का यह बचाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे बहस खत्म नहीं होती।
पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने दूसरा बड़ा सवाल उठाया है-यदि अर्थव्यवस्था सचमुच ७.८ प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है, तो रोजगार, निजी निवेश और विदेशी निवेश में वैसी तेजी क्यों नहीं दिख रही? यदि विकास का आंकड़ा ऊंचा है, लेकिन अच्छी नौकरियां नहीं बन रहीं, निवेश सुस्त है और आम आदमी की आय पर दबाव है, तो जीडीपी और जमीन की अर्थव्यवस्था के बीच अंतर क्यों है? पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने भी गर्ग के विश्लेषण को गंभीर बताया है और निवेश दर में गिरावट को चिंता का विषय माना है। वहीं अरविंद सुब्रमण्यम लंबे समय से भारत की जीडीपी मापन पद्धति, असंगठित क्षेत्र और डिफ्लेटर के उपयोग पर सवाल उठाते रहे हैं। यही इस विवाद का असली केंद्र है। मुद्दा केवल यह नहीं कि ७.८ प्रतिशत सही है या गलत। असली सवाल है-क्या यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की वास्तविक हालत को पूरी तरह दिखाता है?
सरकार के पास सांख्यिकीय पद्धति का बचाव है, लेकिन आलोचकों के पास रोजगार, निवेश और आय के सवाल हैं। आंकड़े तभी भरोसा पैदा करते हैं जब वे जमीन की तस्वीर से मेल खाएं। यदि जीडीपी दौड़ रही है लेकिन रोजगार, निवेश और घरेलू आय पीछे छूट रहे हैं, तो सरकार को केवल प्रतिशत नहीं, उस प्रतिशत का सामाजिक और आर्थिक अर्थ भी देश के सामने रखना होगा। वरना ७.८ प्रतिशत विकास दर उपलब्धि से ज्यादा एक बड़ा सवाल बनकर खड़ी रहेगी।

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