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बैंक हड़ताल से ग्राहक बेहाल

-वेतन-सुविधाओं के बीच बार-बार बंद बैंकिंग सेवा पर सवाल -‘हड़ताल का खामियाजा ग्राहक ही क्यों भुगते?’

-बैंक हड़ताल से देशभर में करीब १ लाख करोड़ रुपए के बैंकिंग कारोबार पर असर पड़ने का अनुमान है

  • अरुण कमार गुप्ता
    बैंक कर्मचारियों की हड़ताल ने एक बार फिर आम ग्राहकों की परेशानी बढ़ा दी है। बैंकिंग व्यवस्था आज रोजमर्रा की जिंदगी की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। ऐसे में बार-बार होने वाली हड़ताल का सबसे ज्यादा नुकसान उस ग्राहक को उठाना पड़ता है, जिसका बैंक कर्मचारियों के आंदोलन से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है। सवाल अब सिर्फ कर्मचारियों की मांगों का नहीं, बल्कि ग्राहकों के अधिकार और बैंकिंग सेवा की जवाबदेही का भी बन गया है। बैंक हड़ताल से देशभर में करीब १ लाख करोड़ रुपए के बैंकिंग कारोबार पर असर पड़ने का अनुमान है।
    बैंक कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन का रास्ता चुनते हैं, लेकिन ग्राहक पूछ रहे हैं कि उनकी जमा पूंजी, पेंशन, वेतन, चेक, कर्ज की किस्त, जरूरी भुगतान और दूसरे बैंकिंग काम आखिर क्यों रुकें? बैंक बंद होने का मतलब केवल एक दिन की परेशानी नहीं है। छोटे कारोबारियों, बुजुर्गों, पेंशनभोगियों और जरूरी भुगतानों पर निर्भर लोगों पर इसका सीधा आर्थिक असर पड़ सकता है।
    वेतन भी मिले, सुविधाएं भी,
    फिर ग्राहक क्यों भुगते?’
    बैंक कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सेवा-सुविधाओं को लेकर अलग-अलग श्रेणियों में काफी अंतर है। ग्राहक वर्ग का सवाल साफ है,अगर बैंकिंग सेवा को आवश्यक सेवा जैसी जिम्मेदारी के साथ चलाया जाता है तो बार-बार होने वाली हड़ताल के दौरान ग्राहक हितों की सुरक्षा कौन करेगा? ग्राहकों के बीच यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि सरकारी बैंकों में जवाबदेही और सेवा की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है।
    इसी नाराजगी के बीच कुछ ग्राहक अब सरकारी बैंकों के निजीकरण की मांग तक करने लगे हैं। उनका तर्क है कि निजी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के कारण ग्राहक सेवा को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है और बैंकिंग सेवाओं को लंबे समय तक बाधित करना आसान नहीं होता, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या निजीकरण अपने आप में समाधान है? सरकारी बैंक केवल मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि ग्रामीण बैंकिंग, छोटे किसानों, गरीबों, पेंशनभोगियों और सामाजिक योजनाओं को लागू करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इसलिए असली मुद्दा सरकारी बनाम निजी बैंक से ज्यादा ग्राहक के प्रति जवाबदेही और सेवा की निरंतरता का है।
    हड़ताल का अधिकार,
    ग्राहक को राहत का अधिकार कब?
    कर्मचारियों को अपनी मांगों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का अधिकार है। लेकिन उसी लोकतंत्र में ग्राहक को निर्बाध बैंकिंग सेवा की अपेक्षा भी है। सरकार, बैंक प्रबंधन और कर्मचारी संगठनों को ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिसमें न कर्मचारियों की आवाज दबे और न ग्राहक को बार-बार बैंक बंदी की कीमत चुकानी पड़े।

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