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संकष्टी चतुर्थी की कथा

शीतल अवस्थी

एक समय भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे। माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा प्रकट की। लेकिन खेल में हार-जीत का निर्णय करने वाला वहां कोई नहीं था। तब भगवान शिव ने घास-फूस से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने बालक से कहा, “हम चौपड़ खेलेंगे। तुम निष्पक्ष होकर बताना कि कौन जीता और कौन हारा।”
खेल आरंभ हुआ। माता पार्वती तीनों बार विजयी हुईं, लेकिन बालक ने भूलवश भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। इससे माता पार्वती क्रोधित हो गईं। उन्होंने बालक को श्राप दिया कि वह एक पैर से लंगड़ा हो जाएगा और कीचड़ में पड़ा रहेगा। बालक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी और कहा कि उससे जान-बूझकर अपराध नहीं हुआ। तब माता ने कहा, “यहां नागकन्याएं गणेशजी की पूजा करने आएंगी। उनके बताए अनुसार तुम गणेश व्रत करोगे तो श्राप से मुक्ति मिलेगी।” कुछ समय बाद नागकन्याएं वहां आईं। बालक ने उनसे गणेश व्रत की विधि पूछी और श्रद्धापूर्वक व्रत किया। भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। बालक ने भगवान शिव और माता पार्वती के पास जाने की शक्ति मांगी। गणेशजी ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। बालक ने कैलाश पहुंचकर भगवान शिव को पूरी बात बताई, तब शिवजी ने भी माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए गणेश व्रत किया। इससे पार्वतीजी प्रसन्न हुईं और पुनः शिवजी के पास लौट आईं।
कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने के लिए यही व्रत किया। कार्तिकेय ने विश्वामित्र को इसकी विधि बताई। विश्वामित्र ने व्रत करके भगवान गणेश को प्रसन्न किया और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। मान्यता है कि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक गणेश पूजन, व्रत और चंद्रमा को अर्घ्य देने से संकट दूर होते हैं। इसीलिए इसे संकष्टी चतुर्थी, अर्थात संकटों को हरने वाली चतुर्थी कहा जाता है।

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