-फिरोज खान
एक वीडियो वायरल हुआ और एक लड़की की जिंदगी खत्म कर दी गई। अमदाबाद की सोफिया फारूक की हत्या का मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है, जहां बेटी की जिंदगी, उसकी पसंद और उसकी दोस्ती पर परिवार अपना अधिकार समझता है। सोशल मीडिया पर किसी वीडियो का वायरल होना अपराध नहीं, लेकिन उसके आधार पर किसी की जिंदगी का फैसला कर देना निश्चित रूप से अपराध और सामाजिक विकृति है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लड़कियों की शादी को आज भी परिवार की ‘इज्जत’ से क्यों जोड़ दिया जाता है? बेटी किससे बात करेगी, किससे मिलेगी और किससे शादी करेगी, इन सवालों पर उसकी अपनी इच्छा को कितनी जगह दी जाती है? माता-पिता को बेटी की शादी में अपनी भूमिका जरूर निभानी चाहिए, लेकिन उसकी जिंदगी का अंतिम पैâसला हिंसा या धमकी के जरिए करना किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।
बेटी इज्जत, बोझ नहीं
समाज को यह समझना होगा कि बेटी परिवार की इज्जत का बोझ नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सपनों वाली एक स्वतंत्र इंसान है। पसंद की शादी हो या परिवार की पसंद से शादी, दोनों मामलों में सबसे जरूरी लड़की की सहमति और सुरक्षा है।
सोशल मीडिया के दौर में तस्वीर और वीडियो कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाते हैं। इसलिए परिवारों को वायरल सामग्री देखकर गुस्से में पैâसला लेने के बजाय बेटी से संवाद करना चाहिए। वहीं युवाओं को भी सोशल मीडिया के इस्तेमाल और निजी सामग्री की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदार होना होगा।
‘इज्जत’ बचाने के नाम पर अगर बेटी की जान ही चली जाए तो ऐसी इज्जत किस काम की? असली इज्जत बेटी को डराने में नहीं, उसकी जिंदगी, उसकी पसंद और उसके अधिकारों का सम्मान करने में है।
