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अब बाप्पा ही हरें महंगाई के विघ्न!

-आलू-प्याज से तेल तक महंगा, रुपया गिरा,
-शेयर बाजार लुढ़का, कर्ज महंगा-ऊपर से डिजिटल
-भुगतान पर शुल्क की मार; जनता बोली, ‘बाप्पा! अब आप ही बचाओ’

सामना संवाददाता / मुंबई

गणेशोत्सव में भक्त हर साल बाप्पा से सुख-समृद्धि और विघ्न हरने की प्रार्थना करते हैं, लेकिन इस बार फरियादों की सूची कुछ ज्यादा ही लंबी है। रसोई से बाजार और बैंक से शेयर बाजार तक आम आदमी की जेब पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आलू-प्याज महंगा, हरी सब्जियां महंगी, दाल-तेल पर दबाव, दूध और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च बढ़ा है। दूसरी तरफ कच्चे तेल की तेजी ने महंगाई के नए दौर की आशंका पैदा कर दी है।
रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ तो आयातित सामान और महंगा होने की आशंका बढ़ गई है। शेयर बाजार में प्रमुख सूचकांक निफ्टी पांच महीने के निचले स्तर पर जा पहुंचा, जिससे निवेशकों की संपत्ति पर भी चोट लगी है। उधर वैश्विक ऋणपत्रों पर ब्याज दर बढ़ने से कर्ज महंगा होने का खतरा मंडरा रहा है। गृह ऋण, वाहन ऋण और कारोबारी कर्ज की मासिक किस्त बढ़ी तो मध्यमवर्ग की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
सोना-चांदी पहले ही आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। मालभाड़ा और परिवहन लागत बढ़ने का खतरा अलग है। अब १५ अक्टूबर से बड़े कारोबारियों द्वारा डिजिटल भुगतान पर व्यापारी छूट शुल्क लगाए जाने की चर्चा ने व्यापारियों की चिंता और बढ़ा दी है। ऐसे में भक्तों की पुकार कुछ यूं है-‘हे विघ्नहर्ता! इस बार मोदक बाद में, पहले महंगाई, महंगे कर्ज और गिरते बाजार का विघ्न हरो!’
रुपया ९६ की खाई पर, बाजार में तेल का भूचाल!
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की तेज कीमतों और अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बढ़ी चिंता ने भारतीय वित्तीय बाजार को एक साथ तीन मोर्चों पर झटका दिया है। रुपया डॉलर के मुकाबले ९५.९५५० पर बंद हुआ और अब ९६ रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है। दूसरी ओर, निफ्टी पांच महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि सरकारी बॉन्ड प्रतिफल चार महीने की ऊंचाई पर जा पहुंचा।
डॉलर के मुकाबले ९५.९५५० पर बंद हुई भारतीय मुद्रा

सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमत को लेकर है, जो करीब १०८ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है। भारत अपनी तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए महंगा कच्चा तेल सीधे आयात बिल और रुपये पर दबाव डालता है।
रुपये की कमजोरी का असर केवल सरकार के विदेशी मुद्रा भंडार तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेशी शिक्षा, विदेश यात्रा और आयातित कच्चे माल तक कई चीजें महंगी हो सकती हैं। बॉन्ड प्रतिफल बढ़ने का मतलब यह भी है कि बाजार को महंगाई और ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने का डर है। यदि यह दबाव जारी रहा तो गृह ऋण, वाहन ऋण और कारोबारी कर्ज की लागत भी प्रभावित हो सकती है। यानी शेयर बाजार में गिरावट केवल निवेशकों की समस्या नहीं है। रुपया, तेल और ब्याज तीनों का दबाव अंततः आम आदमी की जेब तक पहुंच सकता है।
थोक महंगाई फिर १० प्रतिशत के करीब
अगस्त २०२६ : ९.९२ प्रतिशत
जुलाई २०२६ : ९.७८ प्रतिशत
जून २०२६ : ९.९७ प्रतिशत
मई २०२६ : ९.८८ प्रतिशत
खाने-पीने की चीजों की थोक महंगाई
जुलाई : ६.६५ प्रतिशत
अगस्त : ७.०५ प्रतिशत
र्इंधन और बिजली की महंगाई
अगस्त : २२.९३ज्ञ्
क्यों बढ़ी महंगाई?
-खाद्य वस्तुओं के दाम चढ़े
-र्इंधन और बिजली की लागत में तेज उछाल
-विनिर्मित उत्पाद भी महंगे हुए
-पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में बड़ी तेजी
जेब पर क्या असर?
थोक महंगाई सीधे उसी दिन ग्राहक की जेब पर नहीं पड़ती, लेकिन कंपनियों की लागत लगातार बढ़ी तो उसका असर आने वाले दिनों में खाने-पीने के सामान, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा खतरा
चार महीने से थोक महंगाई १०ज्ञ् के आसपास बनी हुई है। यदि कच्चा तेल और र्इंधन महंगा बना रहा तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
१५ अक्टूबर से बदल जाएगा यूपीआई का नियम!
यूपीआई से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों और व्यापारियों के लिए १५ अक्टूबर से बड़ा बदलाव लागू होने जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत २,००० रुपए से अधिक के कारोबारी यूपीआई भुगतानों पर व्यापारियों से ०.४ प्रतिशत व्यापारी छूट शुल्क लिया जाएगा। हालांकि, प्रति लेन-देन अधिकतम शुल्क ३०० रुपए तक सीमित रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्तिगत खातों के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। यानी परिवार, दोस्तों या अन्य व्यक्तियों को पैसा भेजने पर मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। छोटे व्यापारियों को भी राहत दी गई है। महीने में १ लाख रुपए तक यूपीआई भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे कारोबारियों को इस शुल्क से मुक्त रखा जाएगा। रेलवे, पेट्रोल-डीजल, दूरसंचार और बीमा जैसी चुनिंदा सेवाओं में प्रतिशत आधारित व्यापारी छूट शुल्क के बजाय ५ रुपए का निश्चित शुल्क निर्धारित किया गया है।
‘मोदी सरकार की लूट अब यूपीआई तक पहुंच गई!’
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाए जाने को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘मोदी सरकार की लूट अब यूपीआई तक पहुंच गई है।’ खड़गे ने कहा कि आसमान छूती महंगाई से आम आदमी की जेब पहले ही खाली हो चुकी है। ऐसे में महंगाई से त्रस्त जनता को राहत देने के बजाय मोदी सरकार रोज उसकी जेब पर डाका डालने का नया तरीका खोज रही है। खड़गे ने मंगलवार, १५ सितंबर को सामाजिक माध्यम ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा कि अब मोदी सरकार की लूट यूपीआई तक पहुंच गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले ‘यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं’ की व्यवस्था थी, जिसे अब बदलकर २,००० रुपए तक के यूपीआई लेन-देन पर शुल्क नहीं लेने तक सीमित किया जा रहा है।
यूपीआई पर शुल्क, नकदी की फिर वापसी?
१५ अक्टूबर से यूपीआई की नई व्यवस्था डिजिटल भुगतान के लिए नया मोड़ साबित हो सकती है। दो हजार रुपए से अधिक के चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत व्यापारी छूट शुल्क लगाए जाने से बड़े और मध्यम कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है। यह शुल्क ग्राहक से नहीं, बल्कि व्यापारी से लिया जाना है, लेकिन इसका असर बाजार में अलग-अलग रूपों में दिखाई दे सकता है। दस हजार रुपए के भुगतान पर करीब ४० रुपए और ५० हजार रुपए के भुगतान पर २०० रुपए तक शुल्क व्यापारी को देना पड़ सकता है। ऐसे में कम मुनाफे पर चलने वाले कारोबार-इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, फर्नीचर, थोक बाजार और छोटी सेवा इकाइयों में ग्राहक से ‘नकद दीजिए’ कहने की प्रवृत्ति बढ़े तो आश्चर्य नहीं होगा। कुछ व्यापारी इस शुल्क को वस्तुओं की कीमत में जोड़ सकते हैं, कुछ डिजिटल भुगतान से बचने की कोशिश कर सकते हैं, जबकि कुछ सीधे नकद लेन-देन को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी ‘क्यूआर से भुगतान’ की आदत को झटका लगने की आशंका है। हालांकि, छोटे व्यापारियों और दो हजार रुपए तक के भुगतानों को राहत दी गई है इसलिए रोजमर्रा की छोटी खरीदारी पर इसका बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है। लेकिन बड़े भुगतानों और कारोबारियों के लिए यह शुल्क नई लागत जरूर पैदा करेगा।
डिजिटल से फिर नकदी की ओर?
बड़ा सवाल यही है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के दौर में यदि कारोबारियों पर अतिरिक्त शुल्क का बोझ बढ़ता है तो क्या बाजार फिर नकद लेन-देन की ओर मुड़ सकता है? डिजिटल भुगतान की आदत मजबूत करने के बाद कहीं नई शुल्क व्यवस्था बाजार को फिर नोटों की गड्डी की ओर तो नहीं धकेलेगी?

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