मुख्यपृष्ठधर्म विशेषसंकष्टी चतुर्थी की पूजा-विधि

संकष्टी चतुर्थी की पूजा-विधि

 शीतल अवस्थी

संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान श्रीगणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। दिनभर अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत रखा जा सकता है।
पूजा-स्थान को साफ करके लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पास में जल से भरा कलश भी रखें।
सबसे पहले गणेशजी को गंगाजल से स्नान कराएं। फिर रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर, जनेऊ, फूल और माला अर्पित करें। गणेशजी को दूर्वा अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें 21 दूर्वा की गांठें चढ़ाना शुभ माना जाता है। इसके बाद धूप और दीप जलाएं।
भगवान गणेश को मोदक, लड्डू, फल, गुड़ और तिल से बने पकवानों का भोग लगाएं। पूजा के दौरान निम्न मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें,
ॐ गं गणपतये नमः।
इसके बाद संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें। गणेश चालीसा तथा गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ भी किया जा सकता है। अंत में भगवान गणेश की आरती करें और उनसे परिवार के संकट दूर करने की प्रार्थना करें। शाम को चंद्रमा निकलने के बाद तांबे के पात्र में जल, दूध, अक्षत और फूल डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद भगवान गणेश को पुनः प्रणाम करें। इसके पश्चात प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें।

 आवश्यक पूजा सामग्री

* भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र
* लाल या पीला वस्त्र
* कलश और जल
* रोली, चंदन, सिंदूर और अक्षत
* दूर्वा और फूल
* धूप, दीप और घी
* मोदक या लड्डू
* तिल, गुड़ और फल
* चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए तांबे का पात्र
पूजा-विधि में क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।

अन्य समाचार