सामना संवाददाता / मुंबई
भारत की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष २०२६-२७ में ७.१ प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ सकती है। विश्व बैंक की ६ अक्टूबर को जारी इंडिया डेवलपमेंट अपडेट के मुताबिक, मजबूत घरेलू मांग और निर्यात इस वृद्धि को सहारा देंगे। लेकिन ऊंची विकास दर के साथ असली कसौटी यह है कि क्या इसका लाभ रोजगार और आमदनी में भी दिखेगा? रिपोर्ट ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल को अवसर बताया है, पर कामकाज और श्रम बाजार पर इसके दीर्घकालीन असर को अनिश्चित भी माना है।
विश्व बैंक का रोजगार संबंधी संदेश साफ है: कौशल, प्रशिक्षण और कामगारों की क्षमता बढ़ाए बिना विकास का लाभ सब तक नहीं पहुंचेगा। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास तकनीकी रूप से प्रशिक्षित बड़ा कार्यबल, मजबूत सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र और डिजिटल ढांचा है। निजी क्षेत्र का एआई निवेश २०२४ के १.२ अरब डॉलर से बढ़कर २०२५ में ४.१ अरब डॉलर हुआ। वैश्विक क्षमता केंद्रों में काम करने वालों की संख्या भी २०२४ के १९ लाख से बढ़कर २०२५ में २३.६ लाख पहुंची। मगर ये आंकड़े अपने आप यह नहीं बताते कि नए अवसर कितने व्यापक होंगे और पारंपरिक क्षेत्रों के कामगारों पर क्या असर पड़ेगा।
रोजगार का दबाव इसलिए भी बड़ा है कि अगले दो दशकों तक हर साल करीब १.१ करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करेंगे। विश्व बैंक ने पहले कहा था कि देश को निजी क्षेत्र में रोजगार पैदा करने और युवाओं को बाजार की जरूरतों के मुताबिक कौशल देने की जरूरत है। रोजगार केवल नौकरी पाने का सवाल नहीं; नौकरी की गुणवत्ता, नियमित वेतन और सामाजिक सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी हैं।
सरकार के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है कि विकास की रफ्तार बनाए रखना और ऐसी नौकरियां बढ़ाना जिनमें युवाओं को स्थिर आमदनी मिले। इसके लिए लघु उद्योगों को सस्ता कर्ज, श्रम-प्रधान विनिर्माण को बढ़ावा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पादकता बढ़ सकती है, लेकिन उसके फायदे तभी जनहित में होंगे जब कामगारों को नए कौशल सीखने का अवसर मिले और बदलते रोजगार में पीछे छूटने से बचाया जाए। ७.१ प्रतिशत की वृद्धि उत्साहजनक अनुमान है; जनता के लिए उसकी असली सफलता रोजगार, वेतन और सुरक्षित काम में दिखेगी।
