भारतीय उपासना परंपरा में प्रार्थना केवल अपने सुख और सफलता तक सीमित नहीं है। देवी से समस्त संसार की बाधाएं शांत करने, प्राणियों की रक्षा करने और सबके जीवन में सुख-शांति स्थापित करने की प्रार्थना ही सामूहिक कल्याण की वास्तविक भावना है।
मां दुर्गा की आराधना शक्ति, सुरक्षा और संकटों से मुक्ति के लिए की जाती है। भक्त सामान्यतः अपने परिवार, स्वास्थ्य, धन और सफलता के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं, लेकिन देवी उपासना का व्यापक उद्देश्य संपूर्ण समाज और संसार का कल्याण है। दुर्गा सप्तशती में ऐसे अनेक मंत्र और श्लोक हैं, जिनमें किसी एक व्यक्ति के बजाय समस्त लोकों की रक्षा तथा सभी प्रकार की बाधाओं की शांति की कामना की गई है।
सामूहिक कल्याण की भावना से मां दुर्गा का यह मंत्र पढ़ा जाता है-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥
इसका सरल अर्थ है- हे संपूर्ण जगत की अधीश्वरी देवी! आप तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करें और हमारे जीवन में विद्यमान शत्रुतापूर्ण तथा विनाशकारी प्रवृत्तियों का नाश करें।
केवल बाहरी शत्रु के विनाश की प्रार्थना नहीं
मंत्र में आए ‘वैरि-विनाशनम्’ का अर्थ केवल किसी व्यक्ति या बाहरी शत्रु का विनाश मांगना नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, हिंसा और द्वेष मनुष्य के सबसे बड़े आंतरिक शत्रु हैं। जब ये प्रवृत्तियां बढ़ती हैं, तो परिवार से लेकर समाज तक अशांति उत्पन्न होती है।
इसलिए इस मंत्र का जप करते समय किसी व्यक्ति के अहित की भावना नहीं रखनी चाहिए। देवी से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे अन्याय, रोग, भय, हिंसा, वैमनस्य और नकारात्मकता को समाप्त करके समाज में प्रेम, न्याय और सद्भाव स्थापित करें।
देवी सबमें मातृभाव जगाएं
सामूहिक कल्याण के लिए देवी माहात्म्य का यह प्रसिद्ध मंत्र भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
इस मंत्र में प्रत्येक प्राणी में मातृशक्ति के रूप में उपस्थित देवी को नमन किया गया है। इसका संदेश है कि जब हम प्रत्येक मनुष्य में देवी का अंश देखते हैं, तब जाति, वर्ग, भाषा, लिंग अथवा आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
इसी स्तुति में देवी को बुद्धि, दया, क्षमा, शांति, श्रद्धा और शक्ति के रूप में भी प्रणाम किया गया है। ये सभी गुण सामूहिक कल्याण की आधारशिला हैं।
भयमुक्त समाज की प्रार्थना
दुर्गा उपासना में यह श्लोक भी व्यापक कल्याण की भावना व्यक्त करता है-
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
अर्थात—हे सभी रूपों में स्थित, सबकी अधीश्वरी और समस्त शक्तियों से संपन्न देवी दुर्गा! सभी प्रकार के भय से हमारी रक्षा कीजिए। आपको नमस्कार है।
इसमें ‘हमारी रक्षा’ का भाव व्यक्तिगत न होकर सामूहिक है। बीमारी, प्राकृतिक आपदा, युद्ध, हिंसा, अन्याय और सामाजिक असुरक्षा के समय इस मंत्र का पाठ सबके कल्याण की कामना से किया जा सकता है।
विश्व-शांति का वैदिक भाव
सामूहिक मंगल के लिए भारतीय परंपरा का यह प्रचलित शांति-मंत्र भी पढ़ा जा सकता है—
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें, सभी का मंगल हो और किसी को भी दुःख न मिले। यह प्रार्थना धर्म, क्षेत्र या समुदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरी मानवता के कल्याण का संदेश देती है।
सामूहिक जप की सरल विधि
परिवार, मंदिर, संस्था अथवा सार्वजनिक पूजा में सभी लोग स्वच्छ स्थान पर बैठकर मां दुर्गा का ध्यान करें। दीप प्रज्वलित करके पहले देवी का सामान्य मंत्र—
ॐ दुं दुर्गायै नमः
का ११ बार जप करें। इसके बाद सामूहिक कल्याण मंत्र का ११, २१ अथवा १०८ बार पाठ किया जा सकता है। अंत में विश्व-शांति और सभी प्राणियों की रक्षा की प्रार्थना करनी चाहिए।
जप में ऊंची आवाज या बड़ी संख्या से अधिक महत्त्व एक लय, स्पष्ट उच्चारण और शुद्ध भावना का है। यदि सामूहिक पाठ हो तो सभी साधकों को एक ही गति और स्वर में मंत्र पढ़ना चाहिए।
मंत्र के साथ सेवा भी आवश्यक
सामूहिक कल्याण की प्रार्थना तभी पूर्ण होती है, जब उसके साथ सेवा और सदाचार भी जुड़ें। भूखे को भोजन, रोगी को उपचार, जरूरतमंद को सहायता, बालिकाओं को शिक्षा और पीड़ित को न्याय दिलाने का प्रयास देवी की व्यावहारिक आराधना है।
मां दुर्गा की शक्ति अन्याय के विरोध और निर्बल की रक्षा की प्रेरणा देती है। इसलिए सामूहिक कल्याण का मंत्र केवल पूजा का पाठ नहीं, बल्कि यह संकल्प भी है कि हमारा ज्ञान, सामर्थ्य और साधन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की भलाई के लिए उपयोग हों।
