अभिव्यक्ति

सबकी नियती अपनी-अपनी,
सबकी अभिव्यक्ति भी अपनी-अपनी होती हे।
सभी अपने-अपने अतीत से जुड़े हैं,
वर्तमान की समीक्षा तटस्थ हो कर करना
थोड़ा मुश्किल होता है।
अपने अंधेरे -उजालों से
जो साफगोई से
निपटता है वही खड़ा रह पाता है।
तुम समय की प्रतीक्षा नहीं करते,
सत्य तो यह हे कि
समय तुम्हारी प्रतीक्षा करता है।
माली ना भी चाहे तो भी,
मधुमास उपवन में रंग भर देता है।
प्रेम की डोरी में गिरह ना डालो,
जब हाथ गिरह डालते हैं तो
उसे खोल नहीं पाते,
कभी-कभी उन्हें दांतों से खोलना पड़ता है।
दंश भरा अतीत रहा हो तो भी,
वर्तमान संवार लो।
भविष्य कब किसने देखा हे।
अमावस के बाद शने:-शने:बड़ता चंद्रमा,
पूर्णिमा को शोभित करता हे।
जियो और जीने दो का मंत्र रहे स्मरण,
फिर मोक्ष मिले ना मिले।
-बेला विरदी

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