ब्राजील और सर्बिया के चुनावी नतीजों पर भारतीय जनता को पैनी नजर से देखना चाहिए। दोनों चुनावों पर क्रमश: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के पुतिन का प्रभाव और दबाव था। ब्राजील में राष्ट्रपति पद के चुनाव में वामपंथी विचारधारा और डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी नीतियों के कड़े विरोधी रहे लुईज इनासियो लुला डा सिल्वा की फिर से जीत हुई है। ट्रंप प्रशासन ने लुला की हार के लिए बहुत यत्न किए, लेकिन जनता ने ट्रंप वगैरह को भाव न देकर लुला को विजयी बनाया। यह केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि लोकतंत्र जीवित रहे इस जिद और जनमत की जीत है। उसी समय सर्बिया में चुनाव हुए और दो साल से आंदोलन कर रहे वहां के छात्र संगठन की जीत हुई। बारह साल से सर्बिया में पुतिन के कारिंदों के रूप में काम करने वाली सरकार थी। छात्रों की एकजुटता ने पुतिन समर्थक सरकार की हार तय कर दी। तानाशाही तरीके से शासन करने वाला हुक्मरान कितना भी मजबूत क्यों न लगे, जब जनता विरोध में आ जाती है तो उसका सिंहासन डगमगाने लगता है। सर्बिया एक यूरोपीय देश है। वहां की गतिविधियां भारत के दृष्टिकोण से अहम साबित होती हैं। भारत में इस समय सत्ताधारियों का भ्रष्टाचार, परीक्षाओं में धांधली और चुनाव तंत्र में भ्रष्टाचार को लेकर युवा पीढ़ी और छात्र वर्ग सड़कों पर उतरा है। सर्बिया में छात्र संगठन २०२४ से
सड़कों पर उतरे
थे। नोवी साद शहर में रेलवे स्टेशन की छत का हिस्सा ढहने से सोलह लोगों की मौत हो गई थी। उसके बाद शुरू हुआ वहां का छात्र आंदोलन दो साल चला और भ्रष्ट सत्ताधारियों का `रेजिम चेंज’ करवाकर ही रुका। सर्बिया का जन-आंदोलन भ्रष्टाचार, तानाशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव के खिलाफ था। २०१४ से सत्ता में काबिज पुतिन समर्थक अलेक्जेंडर वुचिच को `जेन-जी’ के हाथों हार का सामना करना पड़ा। छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए वुचिच ने दमनकारी नीतियां अपनार्इं। अनगिनत विद्यार्थियों को जेल में डाला, उनके परिवारों को प्रताड़ित किया। फिर भी छात्र लड़ते रहे। `स्टूडेंट लिस्ट’ नाम की पार्टी की स्थापना चुनाव से ठीक चालीस दिन पहले हुई। इस पार्टी को मान्यता न मिले इसलिए वहां के चुनाव आयोग पर दबाव था। अब चुनाव जीतने वाले एक सौ इकतालीस लोगों में से एक भी विद्यार्थी नहीं है। खिलाड़ियों, किसानों और आम कार्यकर्ताओं को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया और विद्यार्थियों ने उम्मीदवारों के चयन, उनके प्रचार और जन-सहयोग से चंदा इकट्ठा करने पर ध्यान दिया। यानी आम लोगों ने तय किया और सर्बिया व ब्राजील में ट्रंप और पुतिन का हुक्म चलाने वालों की हार हुई। दो देश हैं, दो अलग संदर्भ हैं, लेकिन संघर्ष का धागा समान है। ब्राजील में अनुभवी नेता ने जनता का विश्वास जीता। उसने अपने देश को
अमेरिका का गुलाम
बनाए रखने से इनकार कर दिया और ब्राजीलियाई जनता ने राष्ट्रप्रेमी नेता के रूप में लुला का समर्थन किया, जबकि सर्बिया में युवाओं के आंदोलन ने मगरूर सत्ता का किला जमींदोज कर दिया। इस बार दोनों जगहों पर लोगों ने जमकर मतदान किया। ब्राजील में तो मतदान केंद्रों पर भीड़ ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को मतदान के लिए दो घंटे का समय बढ़ाना पड़ा। अब लुला के विरोधी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो घंटे का समय बढ़ाने से लुला की जीत हुई। यह महज रोना-धोना है। ब्राजील की जनता को राष्ट्रपति ट्रंप का गुलाम बनना मंजूर नहीं था। इसके लिए जनता बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरी। लोकतंत्र जब जिंदा होता है तब जनता भी बेखौफ होकर बाहर निकलती है, मतदान करती है और राष्ट्रहित में फैसला सुनाती है। ब्राजील में सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं और इस दक्षिणपंथी विचारधारा ने अपनी विचारधारा की लहर पैदा करने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार जनता ने जो चाहा वही किया। ब्राजील में प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सनारो की `वंशवाद की राजनीति’ पर मतदाताओं ने कड़ा प्रहार किया। सर्बिया में एक व्यक्ति की मनमानी सत्ता को चुनौती दी गई। सर्बिया में छात्र संगठन जीते और ब्राजील में ईमानदार नेता की जीत हुई। भारतीय जनता को इन दोनों देशों की घटनाओं पर मंथन करना ही चाहिए। संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता और कोई भी लड़ाई एकजुटता से आगे बढ़ाई जाए तो जीत पक्की होती है। लड़ाई में वाम-दक्षिण ले (लेफ्टिस्ट और राइटिस्ट) कुछ नहीं होता, यह सर्बिया और ब्राजील की जनता ने साबित कर दिखाया है!
