* संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) एडवांस्ड तीसरा प्रयास: क्या आईआईटी की दोहरी नीति के कारण हजारों मेधावी छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है?
राजेश सरकार / प्रयागराज
देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए होने वाली ‘जेईई एडवांस्ड’ परीक्षा को लेकर इस समय पूरे देश के छात्रों में भारी आक्रोश व्याप्त है। छात्रों ने एक सुर में आईआईटी की मौजूदा प्रवेश नीति को “विरोधाभासी और भेदभावपूर्ण” करार देते हुए इसके खिलाफ सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए ऑनलाइन देशव्यापी मोर्चा खोल दिया है।
इस छात्र आंदोलन की गूंज अब सीधे ‘संयुक्त प्रवेश बोर्ड’ के गलियारों तक पहुंच चुकी है। आंदोलन से जुड़े सूत्रों से मिली बड़ी जानकारी के मुताबिक, छात्रों के चौतरफा भारी दबाव के बीच संयुक्त प्रवेश बोर्ड अब अपनी दशकों पुरानी नीति में बड़े बदलाव करने और छात्रों को तीसरा प्रयास देने पर सक्रिय रूप से विचार-विमर्श कर रहा है।
* आईआईटी कानपुर के निदेशक की मुहर, बदलाव के मजबूत संकेत!
‘जेईई एडवांस्ड तीसरा प्रयास छात्र आंदोलन’ के नेतृत्वकर्ता शुभम कुमार के मुताबिक, यह न्याय की लड़ाई अब एक बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। आईआईटी कानपुर के निदेशक ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि संयुक्त प्रवेश बोर्ड पूरी प्रवेश व्यवस्था में व्यापक सुधार करने और छात्रों को ‘तीसरे प्रयास’ का न्यायसंगत विकल्प देने पर गंभीरता से मंथन कर रहा है।
इस आंदोलन को इंटरनेट माध्यमों पर भी अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। ऑनलाइन याचिका मंच change.org पर जारी छात्रों की याचिका पर अब तक 13,000 से अधिक सत्यापित छात्र अपने हस्ताक्षर कर चुके हैं और यह आंकड़ा हर मिनट तेजी से बढ़ रहा है।
नीति की दो सबसे बड़ी विसंगतियां: जिसने छात्रों को सड़क पर उतरने पर किया मजबूर आंदोलनकारी छात्रों ने एक विस्तृत शोध पत्र तैयार किया है, जिसमें आईआईटी की मौजूदा नीति के दोहरे मापदंडों को उजागर किया गया है।
* विसंगतियां (मुद्दे) मौजूदा नियम छात्रों का पक्ष / नुकसान मुख्य परीक्षा बनाम एडवांस्ड में भेदभाव जेईई मुख्य परीक्षा (मेन्स) में लगातार 3 साल परीक्षा देने का मौका मिलता है, जबकि जेईई एडवांस्ड में यह सीमा केवल 2 साल तक सीमित है। जब दोनों परीक्षाएं एक ही नामांकन प्रणाली और एक ही लक्ष्य का हिस्सा हैं, तो एडवांस्ड में छात्रों के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों?
* 75 प्रतिशत उपस्थिति बनाम ‘डमी स्कूल’ का खेल नियमित स्कूल जाने वाले छात्रों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ( सीबीएसई) का 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति का नियम लागू होता है। नियमित छात्रों को तैयारी के लिए बहुत कम समय मिलता है, जबकि ‘डमी स्कूल’ (दिखावटी स्कूल) के छात्रों को पूरा समय मिलता है। यह नीति ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के मेधावी छात्रों का हक मार रही है।
* “प्रतिभा को प्रयासों की बेड़ियों में न बांधें”: छात्रों की अंतिम हुंकार
छात्रों का साफ कहना है कि जेईई एडवांस्ड एक बेहद उच्च मानसिक दबाव वाली परीक्षा है, जो केवल एक ही दिन में संपन्न होती है। परीक्षा के दिन किसी छात्र की तबीयत खराब होना, मानसिक तनाव या एक छोटी सी मानवीय भूल उसकी सालों की तपस्या पर पानी फेर देती है। ऐसे में सिर्फ दो प्रयासों की समय-सीमा छात्रों की वास्तविक योग्यता का पैमाना नहीं हो सकती।
छात्रों ने याद दिलाया कि वैश्विक महामारी (कोविड-19) के दौरान भी नियमों में ढील देकर अतिरिक्त प्रयास दिया गया था, जिससे परीक्षा की गुणवत्ता पर कोई आंच नहीं आई थी। छात्रों की सीधे तौर पर मांग है कि वर्ष 2027 की जेईई एडवांस्ड परीक्षा के लिए तीसरा प्रयास बहाल किया जाए, ताकि हर मेधावी को अपनी प्रतिभा को उसके शीर्ष स्तर पर साबित करने का एक निष्पक्ष मौका मिल सके!
