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गपशप कॉलम : महाराष्ट्र में सूखे की दस्तक या सरकारी नियोजन की विफलता?

-राजन पारकर
महाराष्ट्र को प्रगतिशील राज्य कहा जाता है, लेकिन आज इसी राज्य के गांवों में लोग पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हैं। कुएं सूख रहे हैं, खेतों में फसलें मुरझा रही हैं और पशुपालकों के सामने मवेशियों को बचाने का संकट खड़ा है। आखिर विकास के दावों के बीच ग्रामीण महाराष्ट्र की यह हालत क्यों?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अध्यक्ष शरद पवार ने सोलापुर और धाराशिव के दौरे में जलसंकट और चारे की समस्या की ओर ध्यान दिलाया है। सोलापुर जिले के १३९ गांव प्रभावित हैं। १३५ टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है, जबकि ४० कुओं और २१ बोरवेल के अधिग्रहण की नौबत आ चुकी है। ये आंकड़े हजारों परिवारों की परेशानी बयां करते हैं।
टैंकर स्थायी समाधान नहीं!
जलजीवन मिशन, जलयुक्त शिवार और जलसंधारण जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च हुए। बड़े-बड़े दावे और विज्ञापन भी हुए, लेकिन गांवों को आज भी टैंकरों का इंतजार करना पड़ रहा है। आखिर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ कहां पहुंचा? कितने गांवों में नियमित पानी मिल रहा है और कितने जलस्रोत पुनर्जीवित हुए?
पानी के साथ चारे का भी इंतजाम हो!
सूखे की मार केवल इंसानों पर नहीं, पशुधन पर भी पड़ती है। सरकार को चारा बैंक, चारा छावनियां और पशुपालकों के लिए आर्थिक सहायता तत्काल उपलब्ध करानी चाहिए। किसानों का पशुधन उनकी आजीविका का आधार है। सरकारी फाइलों से भूखे पशुओं का पेट नहीं भर सकता।
सरकार से सीधे सवाल!
-प्रभावित गांवों के लिए आगामी छह महीनों की पेयजल व्यवस्था कब होगी?
-बंद जलापूर्ति योजनाएं कब शुरू होंगी?
-चारा छावनियां और चारा बैंक कब खुलेंगे?
-किसानों को फसल नुकसान का मुआवजा कब मिलेगा?
-जलजीवन मिशन और जलयुक्त शिवार का स्वतंत्र ऑडिट कब होगा?
-बड़े प्रकल्पों में पानी के इस्तेमाल पर नियंत्रण कब लगेगा?
लोकतंत्र में राजनीतिक लड़ाइयां अपनी जगह हैं, लेकिन किसानों और ग्रामीणों का संकट भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सत्ता और विपक्ष, दोनों को इस मुद्दे पर एकजुट होना चाहिए। महाराष्ट्र को पानी चाहिए, आश्वासनों की बरसात नहीं! प्यासे नागरिकों को भाषण पिलाकर और भूखे पशुओं को विज्ञापन दिखाकर संकट दूर नहीं होगा। सरकार को घोषणाओं से बाहर निकलकर जमीन पर ठोस काम करना होगा।

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