भीषण सूखे और पहले से बढ़ी हुई महंगाई की वजह से इस बार दिवाली कैसे मनाई जाए, इस चिंता में किसान और आम जनता हैं। इस चिंता को दूर करने के बजाय सरकार आम लोगों को रोज महंगाई के झटके दे रही है। अब मुंबई महानगर क्षेत्र में सीएनजी की कीमतों में प्रति किलो एक रुपए की बढ़ोतरी की गई है। इसके अलावा कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दाम भी दस रुपए बढ़ा दिए गए हैं। यानी होटलों और रेस्टोरेंट का खाना और खाद्य पदार्थ और महंगे हो जाएंगे। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें हमने नहीं बढ़ाई हैं, ऐसा ढोंग सरकार ने रचा है। लेकिन कमर्शियल गैस के दाम बढ़ाकर आपने आम लोगों की जेब पर जो अतिरिक्त वैंâची चलाई है, उसका क्या? गैस की कीमत बढ़ने से बाहर का खाना या खाद्य पदार्थ तो महंगे होंगे ही, लेकिन दिवाली के मौके पर घर-घर लाए जाने वाले तैयार खाद्य पदार्थ, मिठाइयां और फराल (दिवाली के पकवान) भी महंगे हो जाएंगे। सूखे और ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से पहले ही खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। खाद्य पदार्थों की महंगाई की दर हमारे देश में सबसे ज्यादा यानी तकरीबन ७.७४ प्रतिशत है। इसलिए अनाज और
खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान
छू रही हैं। दलहन और दालें ऐसी महंगी हो गई हैं कि मानो वे विलासिता की वस्तुएं हों। इस सारी स्थिति से आम लोगों का घरेलू बजट पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। उसमें रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ा दिया है। इसलिए सभी ईएमआई बढ़ गई हैं। ऊपर से अब सीएनजी और कमर्शियल एलपीजी गैस महंगी करके सरकार ने आम लोगों की कमर ही तोड़ दी है। सीएनजी की यह पिछले छह महीनों में छठी बढ़ोतरी है। कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़ने का हाल भी इससे अलग नहीं है। मई महीने में इस सिलेंडर की कीमत भारी-भरकम एक हजार रुपए तक बढ़ाई गई थी। उसके बाद इन दामों में मामूली कटौती करने का दिखावा सरकार ने किया, लेकिन वह एक ढोंग ही साबित हुआ। क्योंकि अब यह सिलेंडर फिर से दस रुपए महंगा हो गया है। ऐन दिवाली के मौके पर यह झटका देकर सरकार ने क्या हासिल किया? कभी पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं तो कभी सीएनजी के दाम बढ़ते हैं। कभी घरेलू गैस तो कभी कमर्शियल गैस महंगी होती है। पांच राज्यों के चुनाव होने तक अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए रोकी गई महंगाई का घोड़ा अब चौतरफा दौड़ रहा है। खाड़ी युद्ध की आंच लगने के बावजूद ईंधन की कीमतों पर हमने लगाम कसी है, ऐसी डींग हांकने वाले हुक्मरान चुनावों के बाद
महंगाई के मामले में बेलगाम
हो गए हैं। प्रधानमंत्री एक तरफ आम लोगों से किफायत बरतने की अपील करते हैं और दूसरी तरफ महंगाई का प्रहार करके ऐसी व्यवस्था बनाते हैं कि जनता की जेब में कुछ बचे ही नहीं। आम लोग किफायत बरत भी लें तो उसके लिए उनकी जेब में पैसा भी तो होना चाहिए? इसके लिए रोजगार और महंगाई नियंत्रण में होनी चाहिए। रोजगार का सृजन और महंगाई, ये दोनों चीजें मोदी सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं। इसलिए आम लोगों की जेब में या तो पैसा है ही नहीं या जो कुछ थोड़ी-बहुत पूंजी बची है, उसे सरकार की ‘महंगाई रूपी डायन’ खाए जात है। लगभग पूरा महाराष्ट्र इस समय सूखे की आग में झुलस रहा है। उसमें सरकार द्वारा लाई गई महंगाई की मार ने आम लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। मौजूदा स्थिति में न तो महाराष्ट्र के खेतों में फसल है और न ही यहां की जनता की जेब में पैसा है। जमापूंजी में बची-खुची थोड़ी-बहुत बचत निकाल लेंगे और बच्चों की दिवाली मीठी करेंगे, इस उम्मीद में आम इंसान था। लेकिन सरकार के सीएनजी और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी वाले ‘दिवाली गिफ्ट’ ने आम लोगों की इस बची-खुची उम्मीद पर भी पानी फेर दिया है। क्या जनता इस बार दिवाली मनाए ही नहीं, हुक्मरानों की ऐसी ही इच्छा है क्या?
