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`इंडिया’ का जलवा…बीजेपी चारों खाने चित!

– प्रणव प्रियदर्शी
रविवार राजधानी में रैली का दिन रहा। बीजेपी ने इसी दिन प्रोटेस्ट मार्च रखकर ‘प्रोटेस्ट बनाम प्रोटेस्ट’ जैसा सीन बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। राहुल गांधी की अगुआई में रामलीला मैदान में हुई रैली ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी कि बीजेपी नेताओं का पश्चिम दिल्ली में आयोजित मार्च सांकेतिक अहमियत भी हासिल नहीं कर सका।
अगर कुछ राजनीतिक अहमियत बीजेपी के इस प्रोटेस्ट मार्च की कही जा सकती है तो इसी मायने में कि इसने जाने-अनजाने कांग्रेस के हाथ में एक और पत्थर थमा दिया है, जिसका इस्तेमाल वह सही समय पर कर सकती है। बीजेपी का प्रोटेस्ट मार्च इस बात को लेकर था कि कांग्रेस ने रैली के लिए १ नवंबर का दिन चुनकर सिखों की भावनाओं को आहत किया है, क्योंकि १९८४ के सिख विरोधी दंगों के पीड़ित आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं। वह भूल जाती है कि पिछले १२ साल से केंद्र में कांग्रेस की नहीं, मोदी की सरकार है। और अब दिल्ली में भी उन्हीं का राज है। फिर ऐसा क्यों है कि सिख समुदाय को इंसाफ नहीं मिल पा रहा। मगर उससे बड़ी बात इस प्रोटेस्ट मार्च की यह रही कि इसकी अगुआई केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को सौंपी गई। एप्सटीन फाइल को लेकर आरोपों से घिरे हरदीप पुरी को राज्यसभा में दोबारा भेजने का फैसला ही बीजेपी को भारी पड़ने वाला था, अब प्रोटेस्ट मार्च की अगुआई देकर बीजेपी ने उन्हें फिर से लाइमलाइट में ला दिया है। इस वजह से बीजेपी नेतृत्व के ब्लैकमेल होने का कांग्रेस का आरोप नया जीवन पा गया है।
बहरहाल, रविवार का दिन तो `इंडिया’ गठबंधन की रैली के नाम रहा। रैली में शामिल होने के लिए लोगों के आने का सिलसिला सुबह से ही शुरू हो गया था। जब राहुल गांधी `इंडिया’ के अन्य नेताओं के साथ एक खुले वाहन में निकले तो सड़कों पर भीड़ का यह आलम था कि उनकी गाड़ी बढ़ ही नहीं पा रही थी। कई घंटे बाद वह रामलीला मैदान पहुंचे तो सड़क पर उनके साथ आ रहे लोगों के लिए वहां कोई जगह नहीं बची थी। मैदान पहले ही खचाखच भरा था। लोग बाहर ही खड़े होकर भाषण सुनते रहे।
चुनावी रैलियों में जिस तरह भीड़ लाई जाती रही है, उनसे मुकाबला करें तो यह भीड़ बिल्कुल अलग इस मायने में भी थी कि यहां ऐसा कोई चेहरा ढूंढना मुश्किल था जो मंच से कही जा रही बातों को अच्छी तरह समझ न रहा हो, उनसे सहमति न व्यक्त कर रहा हो। उनकी आंखों की चमक बताती थी कि वे उस बदलाव के लिए उतावले हैं, जिसकी बात मंच से कही जा रही है। राहुल गांधी के भाषण के बाद सड़क पर खड़े कुछ कार्यकर्ताओं की बात गौर करने लायक लगी। उस समूह में चर्चा थी कि बाकी सब कुछ तो ठीक है, लेकिन राहुल गांधी हर भाषण में मोहब्बत की दुकान खोलने वाली बात कह देते हैं वह ठीक नहीं है। इस सरकार ने नफरत फैलाने का ऐसा काम किया है जिस वजह से लोगों के एक हिस्से में भयंकर गुस्सा है। वे लोग इन नेताओं से मोहब्बत की बात सोच भी नहीं सकते। कार्यकर्ताओं के इस समूह की यह बातचीत बताती है कि अगर राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के बड़े नेता इस तरह की सावधानी बरतना जारी न रखें तो कार्यकर्ताओं की सोच और भावनाएं कितनी आसानी से अलग दिशा पकड़ सकती हैं। कहने की जरूरत नहीं कि हर स्तर पर बरती जाने वाली यही सावधानी है जो भारत को भारत बनाए हुए है। उसे फ्रांस या बांग्लादेश बनने से रोके हुए है।

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