-के.पी. मलिक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में २०२७ के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछने लगी है। दिल्ली के रामलीला मैदान में १ नवंबर को हुई ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली ने विपक्षी एकता का संदेश तो दिया, लेकिन इस एकता की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव का एक मंच पर आना राजनीतिक तस्वीर का एक पहलू है, जबकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर खींचतान दूसरा पहलू। बड़ा सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर गंभीर हैं या वे यूपी में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत और विपक्ष के सबसे बड़े दल का दर्जा बचाए रखने की रणनीति पर चल रहे हैं? २०२४ के लोकसभा चुनाव में सपा ने ३७ और कांग्रेस ने ६ सीटें जीतकर भाजपा को बड़ा झटका दिया था। उस चुनाव में दोनों के साथ आने का फायदा स्पष्ट दिखाई दिया। इसके बावजूद अगर २०२७ में अखिलेश कांग्रेस को पर्याप्त सीटें देने से बचते हैं तो यह भाजपा से ज्यादा विपक्ष की एकजुटता के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ३० और ३१ अक्टूबर को अमित शाह का लखनऊ में रहना बेहद महत्वपूर्ण है। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में करीब २,८५० कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की भागीदारी तथा शाह की मौजूदगी बताती है कि भाजपा ने २०२७ के चुनाव को लेकर अपनी तैयारी तेज कर दी है। यह केवल संगठन की बैठक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, बूथ प्रबंधन और जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की कवायद है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि प्रदेश की मतदाता सूची से करीब १ करोड़ २७ लाख हिंदुओं के नाम गायब हैं। उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं से इन नामों को जुड़वाने के लिए अभियान चलाने को कहा। अखिलेश यादव ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री को यह आंकड़ा कहां से मिला और इसका आधार क्या है? यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। चुनाव आयोग के प्रकाशित आंकड़ों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नाम हटाए जाने और नए नाम जुड़ने की संख्या अलग है। योगी का १.२७ करोड़ वाला आंकड़ा कथित रूप से छूटे हुए हिंदू मतदाताओं का दावा है, जिसे आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के बराबर नहीं माना जा सकता। आखिर मुख्यमंत्री के पास यह जानकारी किस स्रोत से आई? क्या यह प्रशासनिक विश्लेषण है या भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा? यदि इतने बड़े पैमाने पर योग्य मतदाता सूची से बाहर हैं तो चुनाव आयोग को भी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब भाजपा के भीतर योगी आदित्यनाथ की स्थिति को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हैं। एक तरफ दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व है, दूसरी तरफ लखनऊ में योगी की अपनी राजनीतिक पकड़ और प्रशासनिक पहचान। संघ की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। चर्चा यह है कि संघ योगी के नेतृत्व के साथ खड़ा है और भाजपा में उन्हें कमजोर करना आसान नहीं होगा। लेकिन इन चर्चाओं को किसी प्रमाणित टकराव या अंतिम राजनीतिक पैâसले के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। भाजपा की रणनीति में मोदी-शाह का केंद्रीय नेतृत्व और योगी का प्रदेशव्यापी चेहरा, दोनों महत्वपूर्ण हैं। असली सवाल यह है कि चुनाव के करीब आते-आते यह संतुलन किस रूप में सामने आएगा।
विपक्ष के लिए सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ा खतरा कांग्रेस और सपा के रिश्तों में छिपा है। आज राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि अगर कांग्रेस अखिलेश से अलग अपनी रणनीति बनाती है और पिछड़ों और दलितों के साथ कोई प्रभावी तालमेल बनाना होगा, तो ही यूपी का चुनावी गणित बदल सकता है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस की संभावित स्वीकार्यता, चंद्रशेखर आजाद का दलित आधार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं के समीकरण भाजपा तथा सपा, दोनों के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। हालांकि, मुस्लिम, जाट और दलित वोट किसी एक दल या गठबंधन की स्थायी संपत्ति नहीं हैं। इनका समर्थन स्थानीय उम्मीदवार, नेतृत्व और राजनीतिक परिस्थितियों से तय होगा। फिर भी कांग्रेस अगर इन सामाजिक समीकरणों को साधने में सफल रही तो वह केवल सपा की सहयोगी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभर सकती है।
दरअसल, अखिलेश यादव के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। उन्हें भाजपा से मुकाबला भी करना है और विपक्ष में अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक हैसियत भी बचानी है। कांग्रेस को कम आंकना उनके लिए रणनीतिक भूल साबित हो सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि केवल राहुल गांधी की रैलियों और राष्ट्रीय मुद्दों से यूपी में सत्ता का रास्ता नहीं खुलेगा; उसे मजबूत संगठन, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों पर काम करना होगा। यूपी २०२७ की लड़ाई में भाजपा का मुकाबला सिर्फ अखिलेश यादव से नहीं, बल्कि विपक्ष की एकजुटता से होगा। सवाल यह है कि अखिलेश भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस को साथ लेकर चलेंगे या कांग्रेस को पीछे रखने की कोशिश में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत होने का अपना दावा ही कमजोर कर बैठेंगे? कहीं ऐसा न हो कि मोदी-शाह की सियासी बिसात पर भाजपा से मुकाबला करने से पहले विपक्ष आपस में ही उलझ जाए।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
