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सवालों से डरने वाला समाज तानाशाही को न्योता देता है!..सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की चेतावनी

सामना संवाददाता / नई दिल्ली-मेघालय
लोकतंत्र की मजबूती केवल संवैधानिक संस्थाओं के अस्तित्व से नहीं, बल्कि नागरिकों के सवाल पूछने और सत्ता सहित हर व्यवस्था की समीक्षा करने की स्वतंत्रता से तय होती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने मेघालय में एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में इसी विषय पर महत्वपूर्ण विचार रखे।
शनिवार को यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मेघालय के १२वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि जिस समाज में सवाल पूछने से डर पैदा हो जाता है, वह अधिनायकवाद के प्रति संवेदनशील हो जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कानून के शासन की आधारशिला बताया। उनके अनुसार अज्ञान, भय और बिना जांचे-परखे विश्वासों के वातावरण में मनमानी शक्ति को बढ़ावा मिलता है।
बिना प्रमाण दावों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति समाज को गलत सूचनाओं और अंधविश्वास के प्रति भी कमजोर बनाती है। न्यायमूर्ति भुइयां ने सार्वजनिक विमर्श के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि स्वस्थ सहभागी लोकतंत्र के लिए जागरूक नागरिक आवश्यक हैं और जागरूकता के लिए सूचनाओं तक पहुंच अनिवार्य है। उन्होंने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की पुस्तक द आइडिया ऑफ जस्टिस का उल्लेख करते हुए संस्थागत लोकतंत्र और व्यवहार में लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच अंतर की चर्चा की। अपने संबोधन में न्यायमूर्ति ने समाज को ‘हम’ और ‘वे’ के खांचों में बांटने वाली मानसिकता के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले लोगों के विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में इन भिन्नताओं का सम्मान जरूरी है। संविधान की प्रस्तावना के ‘हम भारत के लोग’ शब्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने साझा नागरिकता और समान संवैधानिक अधिकारों का महत्व रेखांकित किया। यह किसी विशिष्ट राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक शैक्षणिक संबोधन था। इसके बावजूद उनके विचार लोकतांत्रिक विमर्श, वैज्ञानिक सोच और नागरिक स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने वैज्ञानिक सोच, सूचना के अधिकार और सार्वजनिक बहस को बताया लोकतंत्र की बुनियाद; ‘हम और वे’ की मानसिकता से बचने का संदेश

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