-शीतल अवस्थी
८ नवंबर को दीपावली है। दीपों का यह महापर्व समृद्धि की पूजा के साथ सत्य, विवेक, स्वच्छता और करुणा को घर-व्यवहार में उतारने का संकल्प है।
कार्तिक अमावस्या की रात्रि में लक्ष्मी-गणेश पूजन और दीपमालिका की परंपरा है। रामायण परंपरा इसे भगवान राम की अयोध्या वापसी से जोड़ती है। अनेक क्षेत्रों में काली पूजा, शारदा पूजा और केदार गौरी व्रत भी इसी अवसर पर किए जाते हैं।
पूजा-स्थान को स्वच्छ करके कलश, भगवान गणेश और माता लक्ष्मी का आवाहन करें। दीप, धूप, पुष्प, अक्षत, फल और घर में बना नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है। धन की देवी की पूजा में बहीखाते, कार्य-उपकरण और ईमानदार कमाई का संकल्प विशेष महत्त्व रखता है।
पटाखों से वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और आग लगने का जोखिम बढ़ता है। बच्चों, बुजुर्गों, रोगियों और पशुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दीपावली को दीपों, रंगोली, संगीत और सामूहिक भोजन के माध्यम से आनंदमय बनाया जा सकता है। दीप स्थिर पात्र में रखें तथा विद्युत सजावट के तारों की अच्छी तरह जांच करें।
लक्ष्मी का अर्थ केवल मुद्रा नहीं है; अन्न, ज्ञान, स्वास्थ्य, समय और संबंध भी संपदा हैं। इनका अपव्यय रोकना तथा जरूरतमंद के घर तक उत्सव की खुशियां पहुंचाना ही दीपावली की सच्ची समृद्धि है।
धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं; स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी मामलों में विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।
