मुख्यपृष्ठस्तंभटीएमसी ने उठाए...जस्टिस जॉयमाल्य बागची के फैसलों पर सवाल

टीएमसी ने उठाए…जस्टिस जॉयमाल्य बागची के फैसलों पर सवाल

सामना संवाददाता / कोलकाता
अभिषेक बनर्जी ने अपने बयान में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जॉयमाल्य बागची का नाम लेते हुए पश्चिम बंगाल से संबंधित न्यायिक आदेशों और उनके चुनावी प्रभाव पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान अदालत के हस्तक्षेप से ऐसी परिस्थितियां पैदा हुर्इं, जिन्होंने भाजपा की राह आसान कर दी। उन्होंने न्यायपालिका से यह स्पष्ट करने की मांग की कि मतदाता सूचियों से हटाए गए लाखों नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण क्यों नहीं हो सका।
‘मेरे खिलाफ कार्रवाई कीजिए, मैं खुद अपना मुकदमा लड़ूंगा’
बनर्जी ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि उनके बयान को गलत या कानून के विरुद्ध माना जाता है, तो उनके खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर कानूनी कार्यवाही की जाए। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में वह किसी अन्य पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने पूरी न्यायिक कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने की भी मांग की, ताकि देश के नागरिक स्वयं देख सकें कि चुनाव आयोग ने किन आदेशों का पालन किया और किनकी अनदेखी की। यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बनर्जी न्यायपालिका के प्रति अपना सम्मान और विश्वास कायम रखने की बात कहते हुए उसके चुनाव संबंधी पैâसलों पर कठोर सवाल उठा रहे हैं।
‘पश्चिम बंगाल को
पुलिस स्टेट बना दिया गया’
अभिषेक बनर्जी ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर भी तीखा हमला किया। उनका आरोप था कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल किया जा रहा है तथा लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि जब निर्वाचित प्रतिनिधि और उनके सहयोगी भी निष्पक्ष कार्रवाई तथा न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब साधारण नागरिक किससे उम्मीद करे? महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए बनर्जी ने सवाल किया कि क्या स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां राजनीतिक विरोधियों को डर और दबाव का सामना करना पड़े?
फिर उठी बंगाल में नए चुनाव कराने की मांग
बनर्जी की ताजा टिप्पणी को २८ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की एसआईआर संबंधी टिप्पणी के बाद दिए गए उनके बयान से जोड़कर भी देखा जा रहा है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ संबंधी जांच की वैधानिकता पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। अदालत के अनुसार, पहले दी गई अनुमति अंतरिम व्यवस्था थी। इसके बाद अभिषेक बनर्जी ने सवाल उठाया था कि यदि चुनावी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू अभी अंतिम न्यायिक परीक्षण से नहीं गुजरा, तो उसके आधार पर बने जनादेश की वैधता को लेकर उठे प्रश्नों का समाधान कैसे होगा? उन्होंने पश्चिम बंगाल में पिछली निर्वाचित सरकार को बहाल करने और छह महीने के भीतर नए चुनाव कराने की मांग की थी। साथ ही कहा था कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उन्हें चुनाव से पहले मतदाता सूची में वापस शामिल किया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस की चुनौती
अभिषेक बनर्जी का बयान केवल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की हार पर किसी विपक्षी नेता की प्रतिक्रिया भर नहीं रह गया है। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मताधिकार की रक्षा, न्यायिक आदेशों के पालन और न्यायपालिका की जवाबदेही जैसे व्यापक मुद्दों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। उनके आरोपों के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन लाखों मतदाताओं के नामों पर विवाद था, उनके मामलों का अंतिम निस्तारण कब हुआ, कितने मतदाता चुनाव में मतदान नहीं कर पाए और मतगणना से संबंधित आदेशों का वास्तविक अनुपालन किस हद तक हुआ।
निजी सहायक की गिरफ्तारी पर भी भड़के बनर्जी
पत्रकार परिषद का एक महत्वपूर्ण मुद्दा अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक सुमित रॉय की गिरफ्तारी भी था। बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस पर उनके सहायक को झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले रात के समय एक वाहन से पहुंचकर पुलिस अधिकारियों ने कथित रूप से धनराशि रखी, जिसका इस्तेमाल बाद में उनके सहायक के खिलाफ सबूत के रूप में किया गया। बनर्जी ने दावा किया कि उनके पास इस संबंध में प्रमाण मौजूद हैं और वह आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उन्होंने राज्य के गृह मंत्री को पद से हटाने तथा संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की। बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से जुड़े एक सोशल मीडिया पोस्ट में सुमित रॉय को कथित फर्जी मुठभेड़ में मारने की मांग की गई थी। उन्होंने इसे बेहद गंभीर बताते हुए पूछा कि ऐसी परिस्थितियों में नागरिकों की सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा। इन आरोपों पर पुलिस का स्वतंत्र पक्ष उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं है।
‘मैं २० लाख लोगों का प्रतिनिधि हूं, अदालत में अपनी बात रखने का अधिकार चाहिए’
सोशल मीडिया पर प्रसारित बयान में अभिषेक बनर्जी ने खुद को लगभग २० लाख लोगों का प्रतिनिधि बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका पर सुनवाई के लिए समय मिलने के प्रश्न को उठाया। उनके बयान का आशय था कि जब एक निर्वाचित सांसद लाखों लोगों की आवाज लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचता है, तो उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने न्यायिक सुनवाई की प्राथमिकताओं और आम नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच की परिस्थितियों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने इसके साथ उद्योगपति गौतम अदाणी से जुड़ी एक घंटे के भीतर याचिका और सुनवाई की तुलना भी प्रस्तुत की गई है।

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