श्रीकृष्ण गोकुल में ‘माखनचोर’ के रूप में प्रसिद्ध थे। ‘माखनचोर’ श्रीकृष्ण का उनके बचपन का सबसे प्यारा नाम है। गोकुल-वृंदावन में नंद और यशोदा मइया के साथ बड़े होते हुए कान्हा यानी श्रीकृष्ण माखन यानी मक्खन चुराया करते थे। गोपियों ने मक्खन की मटकियां ऊंचाई पर टंगी होने पर भी वह मित्रों के कंधों पर चढ़कर मटकी फोड़ देते थे और दही-दूध-मक्खन खाते थे। श्रीकृष्ण ने तो सिर्फ माखन चुराया था, लेकिन अब के असली ठगों ने पूरे ‘गोकुल’ पर ही डाका डाल दिया है। इस डवैâती से न सिर्फ महाराष्ट्र में, बल्कि देशभर में खलबली मच गई है। कोल्हापुर के गोकुल दूध उत्पादक संघ की सत्ता का मक्खन हड़पने के लिए उस संघ पर विशेषज्ञ संचालक नियुक्त करने की गुंडागर्दी शुरू हो गई है। मोदी, शाह, फडणवीस को जनता का जनमत स्वीकार नहीं है। लोकतांत्रिक तरीके से दूध संघ पर चुनकर आए बहुमत के पैनल को सत्ता से रोकने के लिए राज्य के हुक्मरानों ने नए हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं। गोकुल के चुनाव में सतेज पाटील के नेतृत्व वाले समविचारी आघाडी को १३, तो हसन मुश्रीफ की महायुति को १२ सीटें मिलीं। असल में समविचारी आघाडी को १५ सीटों पर जीत मिली थी, जबकि ‘ऊपर’ का हस्तक्षेप करवाकर आखिरी वक्त पर पैâसला पलटकर दो सीटें चुरा ली गईं। शौमिका महाडिक, नावेद मुश्रीफ वगैरह अहम लोग हार गए। फडणवीस, मुश्रीफ, महाडिक वगैरह लोगों की इतनी
छीनाझपटी के बाद भी
सतेज पाटील १३ सीटें जीत गए। अब बारह और तेरह में बहुमत किसका है, यह जानते हुए भी अनजान बनने वालों ने ‘तेरह’ का बहुमत ठुकरा दिया। नियमानुसार चौदह होना चाहिए, वरना हम अपने पांच-छह लोगों को बिना चुनाव के संचालक के रूप में गोकुल दूध संघ में घुसा देंगे, यह कहकर फडणवीस मंत्रिमंडल ने वैâबिनेट में ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। एक तरफ अमित शाह, फडणवीस वगैरह खुद की सरकार होने के बावजूद ‘लोकतंत्र की रक्षा के लिए’ रैलियां निकाल रहे हैं, यानी खुद ही अपने खिलाफ रैलियां निकालते जा रहे हैं और उसी वक्त ‘गोकुल’ में सदस्यों द्वारा चुने गए बहुमत को ठुकराकर वहां अपनी सत्ता जबरन थोप रहे हैं। जनता ने हमें हरा दिया, फिर भी हम सत्ता नहीं छोड़ेंगे, यह उनकी जिद है। २०२४ के लोकसभा और विधानसभा चुनाव ये लोग हार ही चुके थे, लेकिन ज्ञानेश कुमार के सहयोग से ये सत्ता में आ गए, यह संदेह अब सच साबित हो गया है। एक गोकुल संघ में विरोधियों की जीत वे स्वीकार नहीं करते। कोल्हापुर के साढ़े पांच लाख दूध उत्पादक सदस्यों द्वारा गोकुल दूध उत्पादक संघ के चुनाव में दिया हुआ यह जनादेश है। २५ में से १३ सीटें जीतनेवाले गुट को अपना अध्यक्ष चुनने का अधिकार है। इस अधिकार को ठुकराने वाली सरकार लोकतंत्रद्रोही है। फडणवीस ने हारे हुए ‘१२’ वालों के १६ करने के लिए नियम बदल दिए।
बहुमत छीन लेने का
यह प्रयास घृणास्पद है। भाजपा का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। सत्ता के लिए वे इतने लाचार और हिंसक हो गए हैं कि एक दूध संघ में हुई हार भी वे पचा नहीं पा रहे हैं। गोकुल दूध संघ पर चार अशासकीय संचालक नियुक्त करके बहुमत पलटने का फैसला कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। फडणवीस प्रेमी पूर्व ‘सुप्रीम’ मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने यह फैसला सुनाया है। गोकुल की सत्ता हथियाने के लिए फडणवीस ने कानून में संशोधन किया, लेकिन इस पैâसले से जिला बैंकों और सहकारी चीनी कारखानों को बाहर रखा गया। यानी कोल्हापुर की जनता ने जिन्हें हराकर घर बैठा दिया, ऐसे नावेद मुश्रीफ, शौमिका महाडिक जैसे लोगों को दोबारा संचालक मंडल में लाने का यह षड्यंत्र है। सरकार अब एक बात का एलान कर दे और वह यह कि आगे से ‘लोकतंत्र’ में बहुमत की जीत स्वीकार नहीं होगी। देश में फिलहाल चुनावी खेल के नियम बदल चुके हैं। हारनेवालों को ही विजयी घोषित किया जा रहा है। यही मोदी, शाह, फडणवीस का लोकतंत्र है। ‘ईडी’ का शिकंजा जिन पर कसा, वे हसन मुश्रीफ भाजपा के खेमे में जा घुसे और अब उन्हें ‘ईडी’ ने सीधी क्लीन चिट दे दी है। गोकुल के चुनाव में उनका बेटा हार गया, फिर भी उस हारे हुए पहलवान का हाथ उठाकर फडणवीस ने उसे विजयी घोषित कर दिया। यह भले ही बौखलाहट भरा दांव हो, लेकिन यह सिर्फ दो घड़ी का ही दांव है। इस दांव को जनता नेस्तनाबूद कर देगी।
