अभिषेक बनर्जी का न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर अभूतपूर्व हमला
सामना संवाददाता / कोलकाता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की पराजय के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी पर बेहद गंभीर आरोप लगाकर दिवाली का धमाका कर दिया है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में भाजपा ने नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने हराया है। उनका आरोप है कि कोर्ट के आदेशों और आश्वासनों के बावजूद लाखों मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रह गए, जबकि मतगणना की प्रक्रिया में भी अदालत के निर्देशों की अनदेखी की गई।
गुरुवार, ५ नवंबर को कोलकाता में आयोजित पत्रकार परिषद में अभिषेक बनर्जी ने कहा कि उनकी पार्टी ने देश की सर्वोच्च अदालत पर विश्वास किया था। उन्हें उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश देगा तो सरकार और चुनाव आयोग को उसका पालन करना पड़ेगा। लेकिन उनके अनुसार, अदालत के दिशानिर्देशों का भी पालन नहीं हुआ और अंतत: इसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला।
‘हमने सर्वोच्च अदालत पर भरोसा किया, यही हमारी भूल साबित हुई’
अभिषेक बनर्जी ने कहा कि प. बंगाल के चुनाव परिणाम को केवल भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक मुकाबले के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनका तर्क था कि चुनाव से पहले मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में लंबी सुनवाई चली। अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद में उनकी पार्टी ने कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया, लेकिन अंतिम परिणाम ने उस भरोसे पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। बनर्जी का आरोप था कि लाखों मतदाताओं के नामों पर सुनवाई और अपील की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही चुनाव संपन्न करा दिए गए। जिन लोगों के मताधिकार को लेकर विवाद था, उन्हें चुनाव में भाग लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति को चुनाव समाप्त होने के बाद मतदाता सूची में वापस शामिल किया जाता है, तो उस नागरिक के छिन चुके मतदान के अवसर की भरपाई वैâसे होगी? उनके मुताबिक, यह केवल चुनाव हारने या जीतने का प्रश्न नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता और मतदाता के संवैधानिक अधिकारों का सवाल है।
मतगणना में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना का आरोप
अभिषेक बनर्जी ने मतगणना प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि ४ तारीख को होने वाली मतगणना से पहले २ तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों के रैंडमाइजेशन के लिए दिशा-निर्देश दिए थे। उनके अनुसार, इस प्रक्रिया में राज्य और केंद्र सरकार के कर्मचारियों की भागीदारी आवश्यक थी, लेकिन राज्य सरकार का एक भी अधिकारी मतगणना की संबंधित प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी बताते हुए पूछा कि जब अदालत के निर्देशों को लागू ही नहीं किया जाएगा, तब निष्पक्ष चुनाव की गारंटी कौन देगा। बनर्जी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि चुनावी प्रशासन ने ऐसे तरीके अपनाए, जिनसे भाजपा को फायदा पहुंचा। हालांकि, मतगणना संबंधी इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित न्यायिक आदेशों से उनका मिलान अभी आवश्यक है।
‘चुनाव के एक महीने के भीतर ईवीएम जला दी गईं!’
तृणमूल सांसद ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर भी सनसनीखेज आरोप लगाया। उनका दावा था कि चुनाव में गड़बड़ी के माध्यम से जीत हासिल करने के बाद एक महीने के भीतर ईवीएम जला दी गईं। उन्होंने पूछा कि यदि चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं तो चुनाव से संबंधित रिकॉर्ड और मशीनों के संरक्षण के मामले में न्यायपालिका ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया।
यह आरोप अत्यंत गंभीर है। हालांकि, ईवीएम जलाए जाने, उसकी परिस्थितियों और वैधानिक प्रक्रिया के संबंध में स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए बनर्जी के आरोप को प्रमाणित चुनावी धांधली का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
