-रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में हांफ रहा मुंबईकर; त्योहार की खुशियों पर महंगाई और घटती क्रयशक्ति की मार!
-त्योहारी खरीदारी से दूरी बना रहे परिवार; देश के ३१ प्रतिशत शहरी परिवारों ने अतिरिक्त खर्च नहीं करने का बनाया मन
सामना संवाददाता / मुंबई
जिस मुंबई की पहचान उसकी रफ्तार, रोजगार, चमक-दमक और उत्सवप्रियता से होती है, उसी महानगर में इस बार दिवाली की तैयारियों के बीच आर्थिक तंगी की चिंता भी दिखाई दे रही है। एक तरफ बाजारों में महंगी मिठाइयां, आकर्षक उपहार, डिजाइनर कपड़े और रंग-बिरंगी रोशनी सज रही है, तो दूसरी तरफ ज्यादातर परिवारों के सामने सवाल है कि पहले घर का राशन खरीदें, बच्चों की फीस भरें, बिजली का बिल चुकाएं या त्योहार मनाएं?
महानगर में रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ता खर्च आमदनी का बड़ा हिस्सा निगल रहा है। ऐसे में दिवाली के लिए अलग से बजट निकालना कई परिवारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।
लोकलसर्कल्स के २०२६ के सर्वेक्षण के अनुसार देश के ३१ प्रतिशत शहरी परिवारों ने सितंबर से नवंबर के त्योहारी मौसम में नियमित घरेलू खर्च के अलावा कोई अतिरिक्त खरीदारी नहीं करने की योजना बताई। सर्वेक्षण में ३०७ जिलों के शहरी उपभोक्ताओं की ६७ हजार से अधिक प्रतिक्रियाएं शामिल थीं।
मिठाइयां भी महंगी, खरीदारी में कटौती!
इस वर्ष मिठाइयों और सूखे मेवों की बढ़ती कीमतों ने भी उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाई है। कच्चे माल, पैकेजिंग और अन्य लागत बढ़ने के कारण मिठाई विक्रेताओं ने अपनी कीमतें लगभग १५ प्रतिशत बढ़ाई हैं। मुंबई के प्रसिद्ध मंगलदास मार्वेâट में भी इस बार खरीदारों का रुख सावधानी भरा बताया गया है। स्थानीय कारोबारियों के अनुसार, कपड़ों की ऊंची कीमतों के कारण ग्राहक जरूरत के हिसाब से खरीदारी कर रहे हैं। मुंबई जैसे महानगर में किराया, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और खाद्य सामग्री पर होने वाला खर्च घरेलू बजट पर निरंतर दबाव डालता है। सीमित आय वाले परिवारों के लिए त्योहार पर खर्च करना बचत और आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने का कठिन पैâसला बन गया है। ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि आर्थिक तंगी के बीच आम परिवार की वास्तविक क्रयशक्ति कितनी कमजोर हुई है। यदि रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के बाद त्योहार मनाने के लिए पर्याप्त पैसा ही नहीं बचता, तो बाजारों की चमक और आम नागरिक की आर्थिक स्थिति के बीच बढ़ते अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस दिवाली नए कपड़ों
से भी परहेज!
सीवोटर के एक अन्य सर्वेक्षण में ४५.४ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि वे इस त्योहारी मौसम में नए कपड़े खरीदने की योजना नहीं बना रहे हैं। इसी सर्वेक्षण में ५३.६ प्रतिशत ने कहा कि पिछले एक वर्ष में उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ी है। त्योहारों पर नए कपड़े खरीदना भारतीय परिवारों की पुरानी परंपरा रही है।
