– बाढ़, प्रदूषण और कचरे की समस्या बरकरार
-इस मानसून में दावों की असली परीक्षा
जेदवी / मुंबई
मनपा ने वित्तीय वर्ष २०२६-२७ के बजट में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए २०,७३० करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया है। यह राशि बीएमसी के कुल पूंजीगत बजट का ४३.०४ प्रतिशत है। हालांकि, हर वर्ष मानसून में जलभराव, बढ़ते प्रदूषण और सिकुड़ते हरित क्षेत्रों से जूझ रही मुंबई में इतने बड़े बजट के वास्तविक परिणामों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मनपा लगातार तीसरे वर्ष ‘क्लाइमेट बजट’ पेश कर रही है और दावा कर रही है कि मुंबई देश की पहली ऐसी महानगरपालिका है, जिसने जलवायु आधारित बजट व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया है। पिछले वर्ष इस मद में १६,३२१ करोड़ रुपए का प्रावधान था, जिसे इस बार बढ़ाकर २०,७३० करोड़ रुपए कर दिया गया है।
इस बजट के तहत ऊर्जा, परिवहन, कचरा प्रबंधन, हरित क्षेत्र, वायु गुणवत्ता और बाढ़ नियंत्रण जैसे छह प्रमुख क्षेत्रों में २४ कार्य योजनाओं को शामिल किया गया है। मुंबई क्लाइमेट एक्शन प्लान के तहत वर्ष २०५० तक शहर को ‘नेट-जीरो’ और जलवायु-सहिष्णु बनाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन सवाल यह है कि जब मौजूदा समस्याओं का समाधान अब तक नहीं हो पाया है, तो दूरगामी योजनाओं का लाभ आम नागरिकों तक कब पहुंचेगा?
मनपा ने शहरी बाढ़ नियंत्रण, जल संसाधन प्रबंधन, कचरे के वैज्ञानिक निपटान, इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार और हरित क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता देने का दावा किया है। देवनार और मुलुंड डंपिंग ग्राउंड से जुड़े प्रकल्पों को भी अहम बताया गया है। इसके बावजूद वर्षों से लंबित बाढ़ नियंत्रण और कचरा प्रबंधन परियोजनाओं की सुस्त रफ्तार प्रशासन की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े कर रही है।
एक नई पहल के तहत जी-नॉर्थ, जी-साउथ, एफ-नॉर्थ और एफ-साउथ वॉर्डों में ‘वॉर्ड स्तरीय क्लाइमेट बजटिंग’ का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। दावा है कि इससे स्थानीय स्तर पर बाढ़, हीट जोन और आधारभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का समाधान होगा। मगर नागरिकों का कहना है कि अब उन्हें योजनाओं और घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर दिखने वाले परिणाम चाहिए। मनपा के अनुसार वर्ष २०२५-२६ के क्लाइमेट बजट के तहत ७७.९१ प्रतिशत कार्यान्वयन प्रगति हासिल की गई है।
सवालों के घेरे में क्लाइमेट बजट
मनपा ने २०२६-२७ में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए २०,७३० करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, लेकिन हर मानसून में जलभराव, बढ़ते प्रदूषण और अधूरी परियोजनाओं के बीच नागरिक अब दावों से ज्यादा जमीन पर दिखने वाले परिणामों का इंतजार कर रहे हैं।
