-शिंदे भाऊ, ई गठबंधन बा कि एक-दूसरे की लंगड़ी खींचने का अखाड़ा?
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की राजनीति भी गजब तमाशा है! मंच पर महायुति के नेता एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एकता का संदेश देते हैं और चुनावी मैदान में पहुंचते ही एक-दूसरे की राह में उम्मीदवार खड़े नजर आते हैं! अब पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का मामला देख लीजिए। खबर है कि उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सानप का समर्थन किया है। इससे भाजपा के साथ राजनीतिक मतभेदों की चर्चा शुरू हो गई है।
अरे शिंदे भाऊ, ई कौन-सा गठबंधन धर्म बा?
सरकार चलाने के लिए साथ, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए अलग-अलग रास्ता! मतलब मंत्रालय में दोस्ती और मैदान में कुश्ती? महायुति में भाजपा सबसे बड़ी साझेदार है। शिंदे गुट भी सरकार में महत्वपूर्ण भागीदार है। दोनों दल जनता के सामने स्थिर सरकार और मजबूत गठबंधन की बात करते हैं। मगर जब अपने-अपने राजनीतिक हित सामने आते हैं, तब गठबंधन का गणित अचानक बदलने लगता है। अब सवाल यह है कि यदि किसी चुनाव में दोनों सहयोगियों की पसंद अलग है तो मतदाता किसे महायुति का वास्तविक प्रतिनिधि समझे?
वैसे गठबंधन में शामिल दलों को अलग उम्मीदवारों का समर्थन करने का अधिकार है। इसमें अपने आप कोई संवैधानिक गड़बड़ी नहीं है। लेकिन राजनीतिक एकता का दावा करने वालों से इतना तो पूछा ही जा सकता है कि यह एकता किन चुनावों तक लागू होती है? मजेदार बात तो यह है कि चुनाव में जीत किसी की भी हो, बाद में गठबंधन की उपलब्धि बताने का रास्ता खुला रहता है!
वाह रे राजनीति! चित भी मेरी, पट भी मेरी!
अब जनता पूछ रही है कि गठबंधन का मतलब साझा विचार है, साझा सरकार है या केवल साझा सत्ता? अरे भिया, दिन में गठबंधन की कसमें और चुनाव में एक-दूसरे को पटखनी देने की तैयारी! ई महायुति सठिया गइल का… कि गठबंधन धर्म का नया पाठ पढ़ाया जा रहा बा?
